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रविवार, 4 नवंबर 2012

मेरे एक माधुर्य गुण प्रधान ग्रन्थ 'गुन्जन' से



             

शरद             शरद-ऋतु
  ==           =========

         प्यारा प्यारा, सुन्दर सुन्दर, ‘शरद का यह  मौसम’ |
  भर    
          भरता उमंग मन के अन्दर, ‘शरद का यह मौसम || मौसम'                                           

  ‘जल का दर्पण’ दिखलाते हैं, ‘ताल-नदी के कूल’ ||

 आज उपेक्षित घासों पर भी, खिल आये हैं फूल |

   ‘छटा’ बिखेर के, ‘हास’ लुटाते, हैं कितना अनमोल !

   ‘इन फूलों की गोद’ में, ‘तितली-भँवरे’ रहे हैं झूल ||
   
      बना आज है ‘सुख का सागर’, ‘शरद का यह मौसम’||
         
         प्यारा प्यारा, सुन्दर सुन्दर, ‘शरद का यह  मौसम’ ||१||


                   विजयादशमी, करवाचौथ, दिवाली के उपहार |
         
         भाई-दूज, कातिकी-पूनम, का ले कर ‘प्यार’ ||
                   
         ‘हर्ष और उल्लास’ बटोरे, मगन हुई, यह आयी-
         
         ‘यह ऋतु’ लायी, ‘अपनी झोली’ में कितने ‘त्यौहार’ !!
         
          चला बनाने, हर घर ‘मन्दिर’, ‘शरद का यह मौसम’ ||
         
         प्यारा प्यारा, सुन्दर सुन्दर, ‘शरद का यह  मौसम’ ||२||

           कोयल, मैना, तोते, हरियल, गाते ‘चरों ओर’ |
         
          ‘पके धान के खेत’ सुहाते, भाते चारों ओर ||
         
           मक्का, ज्वार, बाज़रा, तिल की पकी झुकी हर डाल |
            
          इन डालों पे पन्छी, दाने खाते चारों ओर ||
         
          लाया बड़ा ‘खुशनुमा मंज़र’, ‘शरद का यह मौसम’ ||
           
         प्यारा प्यारा, सुन्दर सुन्दर, ‘शरद का यह  मौसम’ ||३||

        
         कनेर, कचनारों की डाली, हँसी, झुकी लजियाती |  
            
         फूलों जैसी ‘फूली खुशियाँ’, ‘हर दिल’ में भर जातीं ||      
        
         आसमान में धूल नहीं है, औ कीचड़ धरती पर-
          
         ‘हर बगिया’, ‘सुन्दर “प्रसून” के गुच्छों’ से सज जाती ||
         
         लेता है सब के मन को हर, ‘शरद का यह मौसम’ ||
        
         प्यारा प्यारा, सुन्दर सुन्दर, ‘शरद का यह  मौसम’ ||४|| ||  ||

            
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शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

करवा चौथ (खुशियों के उपहार')






सब को शुभ हो, 'करबा चौथ' का यह पावन त्यौहार !

सभी की 'झोली' में भर जायें, 'खुशियों के उपहार' !!
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किसी बहन का 'असमय-अकाल' कहीं 'सुहाग' न  उजड़े |

'किसी बाग' में 'तरु खुशियों का' मत 'आँधी' से उखड़े || 

सब के 'सुहाग-बाग' में पनपे, 'फूली फली बहार' || 

सब को शुभ हो, 'करबा चौथ' का यह पावन त्यौहार !!१!!



'करवा-घट' में भरे 'प्रेम-रस',जिसका मधुर हो स्वाद  |

'भाग्य' 'सरसता' भरे, मिले मत, 'कारण हीन विषाद' ||

पति-पत्नी बाँटें इक दूजे को नित 'मीठा प्यार' !!

सब को शुभ हो, 'करबा चौथ' का यह पावन त्यौहार !!२!!


दोनों 'एक निष्ठ आस्था' से, बनें  परस्पर मीत |

मिल कर 'प्रीति की वीणा'  में, भर दें सुन्दर 'संगीत' ||
   
बनी रहे 'झंकार' 'नाद'-मय', कभी  न  टूटें  तार ||

सब को शुभ हो, 'करबा चौथ' का यह पावन त्यौहार !!३!!


'गण'-पति 'बुद्धि' प्रदान करें, औ 'अशिव', करें  'शिव' दूर |

'ऋद्धि-सिद्धि-समृद्धि'  के  फल  से, हो जीवन भर पूर ||

'चाँद'  के दर्शन से भर  जाये, 'चाहत'  में  'उजियार' !!

सब को शुभ हो, 'करबा चौथ' का यह पावन त्यौहार !!४!!


'सींकें  श्रेष्ठ  विचारों  की' मिल  कर  के  बना लें कूँची |

जिससे  रहे  साफ़  सुथरी  सी, 'मन  की  धरा  समूची ||

यह  कूँची  'मन  के  आँगन'  की, 'करकट' सके  बुहार  !!

सब को शुभ हो, 'करबा चौथ' का यह पावन त्यौहार !!५!!


'पौराणिकता'  से  बढ़  कर  है, 'यथार्थ  का परिवेश'  |

'परिवर्तन  में  रहे  सन्तुलन', मिले  हमें  'सन्देश' ||

'नयी-पुरानी सोच' एक जुट, 'युग' का करे सुधार !!

सब को शुभ हो, 'करबा चौथ' का यह पावन त्यौहार !!६!!


'दाम्पत्य-जीवन'  के  मधुवन' में,"प्रसून"  खिल  जायें |

सब  की  'भूली विसरी खुशियाँ', राम  करे  मिल  जायें !! 
   
'दुर्दिन  के  पतझर'  की  'बाग'  पे, पड़े  न  कोई  'मार'  !!

सब को शुभ हो, 'करबा चौथ' का यह पावन त्यौहार !!७!!



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शनिवार, 27 अक्टूबर 2012

याद


मित्रों,आज 'अति व्यस्तता  से,  'जाल में फँसे मुक्त हिरण'  की भाँति कुछ पल चुरा कर,  'स्वर्ग वासी हास्य-

वीर' जसपाल भट्टी की याद तारो ताज़ा कर रहा हूँ | पारिवारिक बेडियाँ जकड़े थीं, फिर  जकड़ लेंगीं | यह भी एक 

एक अनिवार्य मधुर पीड़ा है | 'प्यारा बन्धन' है | भट्टी जी की याद में यह छोटी सी 'पुष्पान्जलि'--  

(चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 
   


खुशी बाँटने वालों की याद |
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खुद के ग़मों के दौर में जो सब को हँसाते हैं |
गोया, ‘किसी दोज़ख’ में, ‘एक जन्नत’ बसाते हैं ||

‘ऐसे धीर वीर’, हमें, हमेशा याद आते हैं |
यों तो अनगिनत लोग ‘जहाँ’ में आते जाते हैं ||

‘वीरानगी‘ में वे,’प्यार की बाँसुरी’ बजाते हैं |
या कि, ‘उजड़े चमन’ में,महके हुये गुल सजाते हैं ||

‘मन की कुण्ठाओं’ को ‘प्यार’ से गुदगुदाते हैं |
या फिर ‘तपी दोपहरी’ में, ‘बादल’ बरसाते हैं ||

‘रेगिस्तान’ में ‘हँसते “प्रसून”’ कुछ खिलाते हैं |
‘रीती-मन-गागरों’ में, ‘प्रेम-रस’ भर जाते हैं ||


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गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

राम हमारी दुनियाँ में (मेरी पुस्तक ‘प्रश्न-जाल’ से)

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          राम! ‘हमारी दुनियाँ’ में तुम’ कितने ‘रावण’ मारोगे ?
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‘ दानवता की चोट’ से पीड़ित, ‘मानवता’ तो रोई है |

  ‘कुम्भकर्ण की नींद’ मिल गयी,’जागृति’ चैन से सोई है ||
          ‘आराजकता’ की ‘गति’ को है, ‘गहरी नींद’ में सुला दिया-
       इसे जगाने के प्रयास में,भगवन, तुम भी हारोगे ||
          राम! ‘हमारी दुनियाँ’ में तुम, कितने ‘रावण’ मारोगे ??१??

 औ र ‘चेतना’, ‘नशे’ में डूबी, ’मद-आलस’ में, ‘होश’ नहीं |
‘उचित’ और ‘अनुचित’ पहँचाने, ऐसा इसमें ‘जोश’ नहीं ||
‘बुद्धि’ में बैठा ‘कालनेमि’ है,बड़ा ‘स्वेच्छाचारी’ है-
‘व्यवस्थाओं के केश’ हैं उलझे, कैसे इन्हें सँवारोगे ??
राम! ‘हमारी दुनियाँ’ में तुम कितने ‘रावण’ मारोगे ??२??

‘पाप’ की ‘कालिख’ पुती हुई अब, ‘पुण्य’ की ‘हर तस्वीर’ में है |
देखो कितनी ‘दलदल’ पनपी,’सरयू-गंगा-नीर’ में है ||
‘प्रदूषणों की लीला’ ऐसी, इस ‘अमृत’ में ‘विष ही विष’-
सब के सब ‘कीचड़’ में डूबे, किसको किसको तारोगे ??
       राम! ‘हमारी दुनियाँ’ में तुम कितने ‘रावण’ मारोगे ??३??


   राम! तुम्हारी ‘इस धरती’ में, आज ‘किस गली’ ‘धर्म’ बचा ?
   देखो तो’, ‘युग-परिवर्तन’ ने, ‘अवध’ में ‘वध’ का खेल रचा ||
  ‘धूर्त-नीति’ के दानव-कुल’ ने, इस को ‘लंका’ बना दिया –
  मुझे बताओ,कब आ कर के,’धर्म की धरा’ सुधारोगे ??
  राम! ‘हमारी दुनियाँ’ में तुम कितने ‘रावण’ मारोगे ??४??

‘भक्ति-भाव’ में ‘झूठ के दाग’ हैं,’ध्यान’ में ‘लोभ का भार’ भरा |
 ‘हर मन के आँगन’ में कितनी, ‘मैल’ का है ‘अम्बार’ भरा ||
 ‘निष्ठा की कूचियाँ’ हैं टूटी, ‘आस्थायें’ सब ‘दुर्बल’ हैं-
 ‘आँगन-आँगन’ ‘दम्भ के काँटे’, कैसे ‘मैल’ बुहारोगे ??
  राम! ‘हमारी दुनियाँ’ में तुम कितने ‘रावण’ मारोगे ??५??

  ‘प्रेम-प्रसून’ में ‘गन्ध’ नहीं है, चढ़े ‘तुम्हारे चरण’ में जो |
  ‘पुजारियों’ में ‘लोभ’ है व्यापा, आये ‘तुम्हारी शरण’ में जो ||
  ‘मन-मन्दिर’ में ‘गर्त पतन के’, इन में गिरे ये औंधे मुहँ-
   बड़ा कठिन है इन्हें बचाना, कैसे इन्हें उबारोगे ??
   राम! ‘हमारी दुनियाँ’ में तुम कितने ‘रावण’ मारोगे ??६??

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मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

मेरी पुस्तक- 'शंख-नाद' से - !जय बोलो श्री राम की!(अर्द्ध हास्य')



  • !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
  •      
  •    !जय बोलो श्री राम की
  •         
  •    जय बोलो श्री राम की!           
  •                  
  •   !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
  •         
  •      ‘माल मुफ्त का’ खाने वाला |
  •       
  •  ‘थुल थुल पेट’लिये है‘लाला’ ||

  • ‘पूजा-घर’ में फेर रहा है-
  •   
  •      लिये हाथ में‘तस्वीह-माला’ ||
  •    
  •    ‘ध्यान’में‘ग्राहक’,’मन’में‘ दौलत’-

  •    चिन्ता लगी है ‘दाम’ की |

  • जय बोलो श्री राम की !
  •       
  •   जय बोलो श्री राम की !!१!!

  •  

  •     ‘उजले-उजले कपड़े’ पहने |
  •       
  • गले में ‘मणि-मोती के गहने’ ||
  •  
  •      ‘नीयत’ में है ‘खोटा सिक्का’-

  •      ‘सम्बोधन’ में ‘माता-बहनें’ ||

  •      ‘लम्बा प्रवचन’,‘उपदेशी’ का-

  •    ‘धूम मची है’ ‘नाम’ की ||   

  • जय बोलो श्री राम की !

  •       जय बोलो श्री राम की !!२!!


  •  
  • ‘पीली,लाल,सफ़ेद टोपियाँ’ |
  •        बने ‘कन्हैया’, साथ ‘गोपियाँ’ ||
  •        ‘मोती’ स्वयं ‘टटोल’ भर लिये-
  •    बाँट के सब को,’रिक्त सीपियाँ’ ||
  •          ‘पेट’ बड़ा है,’जोंक’ सा ‘मोटा’-
  •  खाते रोज ‘हराम की’ ||
  •    जय बोलो श्री राम की !
  •         जय बोलो श्री राम की !!३!!

  •    
  •    हर दिन ‘मारामारी’ करते |
  •   ‘नेताओं’ से ‘यारी’ करते ||
  •    चबा के ‘बीड़ा’,’खूनी कत्था’-
  •    ‘मोटी’,’हज़म सुपारी करते’ ||
  •    ‘मालिक’ के ‘दुम छल्ले कुत्ते’-
  •    ‘निभा के’,’रीति गुलाम की’ ||
  • जय बोलो श्री राम की !
  •   जय बोलो श्री राम की !!४!!

  •   
  •  
  •    दफ्तर में शतरंज खेलते |
  •    
  • ‘बॉस’की‘झिड़की’ रोज़ झेलते ||
  •  
  •   ‘भारी जेब’ ले घर में आ कर-
  •  
  • ‘लगा के मक्खन’,‘दण्ड पेलते’ ||
  •  
  •    मुफ़्त में ‘मेहनताना’ मिलता-

  •    इन्हें पड़ी क्या काम की !!

  •  जय बोलो श्री राम की !

  •     जय बोलो श्री राम की !!५!!
  •  
  •   
  •  ‘छू कर पाँव’, ‘गये जो मांगे’ | 

  •      दीवारों पर ‘सनदें’ टाँगे ||
  •  
  •     ‘बड़ा सिलसिला’,’सोर्स लंबा’-

  •     क्या है कमी ‘इनाम’ की !!

  •   जय बोलो श्री राम की !

  •     जय बोलो श्री राम की !!६!!
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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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