(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)
‘गुरु की महिमा’ का कभी, किसने पाया ‘पार’ !
‘गुरु-महिमा’ के सामने, है छोटा ‘संसार’ ||
कवियों के गुरु ‘आदिकवि’, वाल्मीकि थे ‘धन्य’ |
रामायण सा रच दिया, काव्य ‘करुणा-जन्य’ ||
‘वृहस्पति’ से ‘देव-गुरु’, ‘अमर ज्ञान’ के ‘कोष’ |
जिसके ‘ज्ञान-प्रसाद’ से, ‘सुर’ पाते ‘सन्तोष’ ||
‘गुरु’ तुम्हारी सदा से, ‘लीला’ अपरम्पार |
‘गुरु-महिमा’ के सामने, है छोटा ‘संसार’ ||१||
‘राम-भक्ति’ का ‘मन्त्र’ दे, नारद ने
हनुमान |
अमर किये ‘युग-युग’ तलक, ‘आस्था-मूर्त्तिमान’ !!
जनक; ‘राजऋषि’ के गुरु, ज्ञानी अष्टावक्र |
जिनकी ‘गीता’, ‘ज्ञान’ की, ‘थाती’ परम विचित्र ||
मेरा क्या जो आप पर, मैं कर सकूँ निसार ?
‘गुरु-महिमा’ के सामने, है छोटा ‘संसार’ ||२||

‘तुला’ परिक्षा की बना, लेते ‘प्रतिभा’ तोल |
जो मानव ‘उत्तीर्ण’ हो, होता वह ‘अनमोल’ ||
‘हरिश्चन्द्र’ से परख कर, बन कर ‘विश्वामित्र’ |
‘ज्ञान-कसौटी’ से किये, ‘मानव’ कई ‘पवित्र’ ||
‘दिल’ में ‘निष्ठा-आस्था’, का भर देते ‘सार’ |
‘गुरु-महिमा’ के सामने, है छोटा ‘संसार’ ||३||
