Blogger द्वारा संचालित.

Followers

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

नयी करवट (दोहा-ग़ज़लों पर एक काव्य ) (५)कागज़ की नाव (ग)अजगर

विकास के इस दौर में यही अजब गजब की बात है कि दूसरे के हित- चिन्तन पर ध्यान  ही नहीं', पेट भरा हो तो भी खुद को मिलता रहे बस !
  (सारे चित्र 'गूगल-खोज'से साभार)
==========    
नहीं कमाते जो कभी, कर के कुछ ‘उद्योग’ |
बिना परिश्रम चख रहे, मीठे ‘मोहन भोग’ ||
एक आदमी दबा कर बैठा है दस ‘काम’ |
और काम को तरसते, फिरते हैं कुछ लोग ||



‘यह’ मिल जाये,औए ‘वह’, भी लग जाये हाथ |
‘हड़प-नीति’ औ ‘हविश’ का, इन्हें अजब है ‘रोग’ ||
कभी ‘धर्म’ में तो कभी, ‘राज-नीति’ में पैठ |
ये ‘नौटंकीबाज़’ कुछ, करने लगते ‘योग’ ||


एक नाम इनका सुनो, है ‘धन का शैतान’ |
सारी जनता से जुड़ा, है इनका ,संयोग’ ||
“प्रसून” इनके ‘बाग’ के, नकली, नकली ‘गन्ध’ |
‘इन्द्रासन’ पर नज़र है, ओढ़े कृत्रिम ‘जोग’ ||

================================   
 मेरे ब्लॉग 'प्रसून' पर 'घनाक्षरी-वाटिका' पंचम कुञ्ज (गीता-गुण-गान) में आप का स्वागत है !   






























सोमवार, 16 दिसंबर 2013

नयी करवट (दोहा-ग़ज़लों पर एक काव्य ) (५)कागज़ की नाव (ख)सियासी सियार |


(सारे चित्र 'गूगल-खोज से साभार)

(ख)सियासी सियार
============  
राजनीति के कुछ चतुर, धूर्त ‘कुटिल सियार’ |
ये मतलब के सगे हैं, नहीं किसी के ‘यार’ ||
हैं मानो ‘चलचित्र’ के, ’नाटकीय सम्बन्ध’ |
नकली इनके हैं सभी, आपस के व्यवहार ||
अथिर ,वासना-पूर्त्ति हित, रखते ‘तन’ से मोह |
‘मन के सागर’ में उठा, क्षणिक ‘प्रेम का ज्वार’ ||


‘हथकण्डे’ रच कर कई, अर्जित करते ‘वित्त’ |
इनके पास अकूत धन, जिसका का कहीं न पार ||
‘वाणी’ मीठी ‘शहद’ सी, बोलें दे ‘रस’ घोल |
पर ‘कटुता’ घोलते, जब करते ‘व्यवहार’ ||
“प्रसून” ‘विष की बेलि’ के, जिनकी ‘मधुर सुगन्ध’ |
सूँघे इनको जो वही, हो जाये ‘बीमार’ ||

==================================
     
 मेरे ब्लॉग 'प्रसून' पर 'घनाक्षरी-वाटिका' पंचम कुञ्ज (गीता-गुण-गान) में आप का स्वागत है !   




रविवार, 15 दिसंबर 2013

नयी करवट (दोहा-ग़ज़लों पर एक काव्य ) (५)कागज़ की नाव (क)उलूक-गिद्ध |

    ==================
धन जिनका ‘भगवान’ है, ‘लक्ष्मी; करते सिद्ध |
‘तन-मन’ दोनों खोखले, ऊपर से समृद्ध ||
करें रात में तस्करी, दिन में बनें ‘दलाल’ |
इनमें कई ‘उलूक’ हैं, हैं थोड़े से ‘गिद्ध’ ||
साम-दाम या दण्ड से,या फिर ‘भेद-कुनीति’ |
चल कर छल से हो गये, कुछ तो जगत्प्रसिद्ध ||


कुछ ‘कुबेर’ के लाल हैं, कुछ ‘कारूँ’ के लाल |
शासन ‘पूजीवाद’ का,करने को कटिबद्ध ||
‘मनमानी’ के ‘धनुष’ पर, ‘अपराधों’ के ‘बाण’ |
‘अनुशासन’ के जिस्म पर, करते रहते बिद्ध ||
‘असुर-दानवों’ के सदा, रहते ‘खुदमुख्तार’ |
‘पाप-ज्ञान’ के ‘ग्रन्थ’ के,प्रवीण और प्रबुद्ध ||


================
मेरे ब्लॉग 'प्रसून' पर 'घनाक्षरी-वाटिका' में आप का स्वागत है !   



गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

नयी करवट (दोहा-ग़ज़लों पर एक काव्य ) (छ) बदलाव (२)छँटी उदासी ‘आप’ की

 

घोर निराशा को तजे, ‘आम आदमी’ आज |
‘आशा-सज्जा’ से सजे, ‘आम आदमी’ आज ||
छोड़े ‘पूँजी-वाद’ को, ‘जाति-वाद’ को छोड़ |
ले ‘आज़ादी’ के मज़े, ‘आम आदमी’ आज ||
करने लगा ‘प्रकाश’ कुछ, बन कर ‘तम’ में ‘दीप’ |  
किसी ‘हवा’ से मत बुझे, ‘आम आदमी’ आज ||
छाया ‘सन्नाटा’ हटा, गूँज उठी ‘आवाज’ |
क्योंकि ‘बिगुल’ बन कर बजे, ‘आम आदमी’ आज ||
निखरे ‘सोने’ से खरे,हटी मलिन हर ‘पर्त’ |
‘अग्नि-प्रेरणा’ से मँजे, ‘आम आदमी’ आज ||
छँटी उदासी ‘आप’ की, मन में खिले “प्रसून” |
अच्छे लगते फिर मुझे, ‘आम आदमी’ आज ||




About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

मेरे सभी ब्लोग्ज-

प्रसून

साहित्य प्रसून

गज़ल कुञ्ज

ज्वालामुखी

जलजला


  © Blogger template Shush by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP