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शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (13) मानवीय पशुता ! (घ) काम-पाश |

 (सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 
मन-सु-गगन  में  काम-घन, उठे निरंकुश  आज |
जगी  वासना  की तड़ित, पशुवत मनुज-समाज ||
तज कर सात्विक भोज  को, अति तामस आहार |
अधिक मद्य  पी  ‘मद’-भरे, ‘पशुओं से ‘व्यवहार’  ||
कामोत्तेजक  चित्र  लख , उठा  वासना-ज्वार |
फिर  संयम के बाँध’  कीटूट   गयी   दीवार ||
भोली चिड़ियाँ  ढूँढतेकामी जन  बन  बाज  |
जगी वासना की तड़ित, पशुवत मनुज-समाज ||1||
मर्यादा से  हीन पशुबन  कर   करे   शिकार |
मानवता   में   पनपते,   जंगल   के  आचार ||
छल-बल-कपट के दाँव  सेकरते  कामुक घात |
शील पे  करते  आक्रमणरच कामी  उत्पात ||
धन-जन-मत या प्रबल तन, का  है ऐसा  राज |
जगी वासना की तड़ित, पशुवत मनुज-समाज ||2||
फ़ुसलाकर, दे  लोभ  कुछडाल  काम  के पाश |
नन्हें  पँछी  प्यार   के,   धूर्त   लेते   फांस ||
कुछ  उलूक-सु   ढूँढ  करकुमारियाँ मजबूर  |
भूखी - प्यासी  विवशताकरें   भोग   भरपूर ||
सम्विधान  रख  ताख  मेंलूटें  ललना-लाज |
जगी वासना की तड़ित, पशुवत मनुज-समाज ||3||

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (13) मानवीय पशुता ((ग) ह्रदय-जाल |

 (सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 


                    

तन के  आधे आवरणदेखो  दिये  उतार !
बना शील का आभरण. खुला रूप-बाज़ार !!
इन वस्त्रों  का  देखिये, क्या ही अजब  कमाल !
ह्रदय  फाँसने के  लियेबने  हुये  ये  जाल !!
शायद कोई  भी जगह, तन  की  रही  न  शेष !
जिसे  ढांकने  में  सफलकामिनियों  के  वेश !!
लाज  छिपाने   में   हुए बेचारे   लाचार !!
हुआ  शील  का  आभरण.  खुला  रूप-बाज़ार !!1!!
इन  वस्त्रों  को  देख कर, जागी  सोई आग !
सोई-सोई,  काम  कीगयी  कामना  जाग !!
इच्छाओं  में  भोग  काभरता  जाता  ताप !
इसी  लिये  अनुराग  कोजला  रहा  संताप !!
और वासना-जलधि  मेंआता  जब-तब  ज्वार !
बना  शील  का  आभरण.  खुला रूप-बाज़ार !!2!!
वस्त्र  सभ्यता  के  सदासे  हैं  रहे  प्रतीक  !
शायद  इन्हें  उतार करहम न  कर  रहे  ठीक !!
तन   ढँकने  के  लिये  हैंहमने  पहने  वस्त्र  |
काम-युद्ध के हित  इन्हेंबना रहे  क्यों  अस्त्र !!
क्यों    दिखलाते  गुप्त  कुछतन  के  चापउभार !
बना  शील  का  आभरण.  खुला रूप-बाज़ार !!3!!

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (13) मानवीय पशुता (ख) कच्ची कलियाँ बावली !

 (सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 

सु-सभ्यता का रख लिया, असभ्यता ने नाम !

चम्पा-पादप में लगे, कनक-कु-फल उद्दाम !!

पंख उठा कर तितलियाँ, रहीँ  इस तरह नाच !

मर्यादायें   टूटतीं,   जैसे  च्चा  काँच !!

भ्रमरों की गुंजार कीजगह  कु-कर्कश राग !

तोते- मैना की जगहघुसे बागमें काग !!

ललित कलाओं की मिटी, सुखद शान्ति अभिराम !

चम्पा-पादप में लगे, कनक-कु-फल उद्दाम !!1!!

        

कच्ची कलियाँ  बावलीपंखुरियों  से  तंग !

स्वयं   दिखाना  चाहतींखुले-अधखुले अंग !!

वस्त्र  पहनने  के  हुयेअजब  निराले  ढंग !

देख  देख  कर  हम  हुये, हैं  हैरत  से  दंग !!

हमें  संस्कृति-प्रदूषण, का  यों  मिला इनाम !

चम्पा-पादप में लगे, कनक-कु-फल उद्दाम !!2!!

                           

टी.वी., सी.डी.,  वीडियोकी   घर-घर  भरमार !

नित्य  नग्नता  का  हुआजिनसे खूब प्रचार !!

जम कर  पी कर, कर नशा, आदत से मजबूर !

ब्लू फ़िल्मों को देख कर, शिशु बचपन से दूर !!

लाते  बाप  खरीद  करकमा कमा कर  दाम’ |

चम्पा-पादप में लगे, कनक-कु-फल उद्दाम !!3!!

                                          

शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (13) मानवीय पशुता (क) पिशाचिनी भूख |

 (सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 
मिटी सादगी  ह्रदय  के, उथले   हुये   विचार !
मानवता   में   पनपते,  पशुता   के   व्यवहार !!
काम-कला  का  प्रदर्शनखुले  में  करते लोग !
पशुओं   जैसा चाहते,   मुक्त  यौन  के  भोग !!
ये  मानवता  के  सभीनियम  रहे  हैं  तोड़ !
पशु-प्रवृत्ति  के प्रदर्शनकी  लगती  है  होड़ !!
इसीलिये  तो   ह्रदय  मेंभरने  लगे  विकार !
मानवता   में  पनपते,  पशुता  के  व्यवहार !!1!!



प्रेम का  अर्थ शरीर  कारमण नहीं  है  मात्र !
कामी जन- तन   भोगतेबना  वासना-पात्र ||
रति की  मदिरा  पी  तथातन को ठोकर मार |
जो  जन  सुख  हैं भोगतेवे  हैं  सभ्य गँवार ||
ऐसे   लोगों   से   बना,   है   जंगल   संसार |
मानवता  में   पनपतेपशुता  के  व्यवहार !!2!!

खुले-खुले  खल खेलतेखुल  कर   रति   के खेल !
इंसानी तहज़ीब  को,   नर्क  में   रहे  ढकेल  !!
देखोक्लब, पार्क  तथासमुद्र-तट  इत्यादि !
में   कामी जन  दिखाकरउच्छृंखल  उन्माद ||
करते   बन्धन   तोड़  करपशुवत   यौनाचार !
मानवता  में   पनपतेपशुता  के  व्यवहार !!3!!

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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