Blogger द्वारा संचालित.

Followers

बुधवार, 24 सितंबर 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (11) स्वर्ण-कीट (ग) सुनहरी मकड़ियाँ |

(सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)

पैनी ‘लोभ-दुधार’ की, पड़ी इस तरह ‘मार’ |
‘भावुकता’ घायल हुई, ‘प्रेम’ में पड़ी ‘दरार’ ||
‘वित्त्वाद’ की ‘मकड़ियाँ’, मन में ली हैं पाल |
चुपके चुपके बुन रही, हैं ‘लालच के जाल’ ||
‘जज्वों’ से सूने हुये, ‘दिल’ बन गये ‘मशीन’ |
रूखे-नीरस हो गये, सभी भाव रंगीन ||
‘स्नेह के कमलों’ पर पड़ी, ‘तेज़ाबी बौछार’ |
‘भावुकता’ घायल हुई, ‘प्रेम’ में पड़ी ‘दरार’ ||१||
‘दुखी’ और भी दुखी हैं, शोषित हो कंगाल |
खाते ‘रूखी रोटियाँ’, बिन ‘सब्जी’ बिन ‘दाल’ ||
कई ‘लुटेरे’ लूटते, उड़ा रहे ‘तर माल’ |
ऊपर से ओढ़े हुये, ‘राजनीति की खाल’ ||
‘जमा खोरियों’ के कई, गरम हुये ‘बाज़ार’ |
‘भावुकता’ घायल हुई, ‘प्रेम’ में पड़ी ‘दरार’ ||२||


धनिकों-निर्धन में हुआ, है ‘खाई’ सा ‘भेद’ |
‘मिट्टी’ से सस्ता हुआ, है श्रीमिकों का ‘स्वेद’ ||
‘समता की कचनार’ पर, ‘हिम’ का हुआ ‘निपात’ |
और  ‘एकता-बेलि’ पर, ‘ओलों’ का ‘आघात’ ||
जनता यदि न सचेत  हो, है बेबस ‘सरकार’ |
‘भावुकता’ घायल हुई, ‘प्रेम’ में पड़ी ‘दरार’ ||३||


रविवार, 21 सितंबर 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (11) स्वर्ण-कीट (ख) रिश्तों का बाज़ार |

(सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)

जगे ‘कंस-रावण’ यहाँ, सोये ‘राम व श्याम’ !
‘वित्तवाद’ की ‘प्रगति’ का, कैसा मिला ‘इनाम’ !!
‘बड़े-बड़े अपराध’ अब, बने हुये ‘व्यवसाय’ !
‘न्याय’ छुपाकर ‘मुहँ’ चला, पनप रहा ‘अन्याय’ !!
‘दहेज़’ के दुष्पाप’ ने, ‘प्रेमी’ लिये लपेट !
भोली भाली लडकियाँ, चढ़ीं इसी की भेंट !!
‘स्नेहिल रिश्तों’ के लगे, महँगे महँगे ‘दाम’ !
‘वित्तवाद’ की ‘प्रगति’ का कैसा मिला ‘इनाम’ !!१!!
मन्दिर-मस्जिद कुछ, कई, गुरूद्वारे व मज़ार |
गिरिजाघर-दरगाह कुछ, बने आज ‘बाज़ार’ ||
हुए ‘सियासत’ के कई, हैं ‘अड्डे’ बेजोड़ |
‘शैतानों’ से कर रहे, चुपके से ‘गठजोड़’ ||
कुछ ‘तीर्थ’ भी हों गये, ‘हैं ‘अधर्म’ के ‘धाम’ |
‘वित्तवाद’ की ‘प्रगति’ का कैसा मिला ‘इनाम’ !!२!!
‘खुदगर्ज़ी’ की ‘डाल’ पर, फलते ‘फल- अपराध’ |
‘शोषण-पशु’ खा कर इन्हें, घूम रहे ‘निर्वाध ||
रोई ‘भारत की धरा’, सूख गये हैं ‘नयन’ !
‘दिल के दर्दों’ को नहीं, कर पाती है ‘सहन’ !!
पता नहीं इस का कभी, क्या होगा परिणाम !
‘वित्तवाद’ की ‘प्रगति’ का कैसा मिला ‘इनाम’ !!३!!


शनिवार, 20 सितंबर 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (11) स्वर्ण-कीट (क) मैली चमक !

(सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)
जुगनू पकड़े हाथ में, ‘मलिन’ हुआ ‘स्पर्श’ !
लालच-‘मैली चमक’ से, ‘उन्हें’ हुआ है ‘हर्ष’ !!
‘’सोने’ के ‘पिंजड़े’ फँसी, ‘मैना’ हुई  ‘गुलाम’ !
‘बन्दी’ बन कर भोग ‘सुख’, समझा ‘दण्ड’ ‘‘इनाम’ !!
‘तृष्णा’ चमकीली बसा, मन व्याकुल  बेचैन !
जगते, सोते, ‘लाभ’ की, ‘चिन्ता’ है ‘दिन-रैन’ !!
पतित हुआ है ‘आचरण’, समझ रहे ‘उत्कर्ष’ !
लालच-‘मैली चमक’ से, ‘उन्हें’ हुआ है ‘हर्ष’ !!१!!


बेच  दिया ‘ईमान’ को, बेचा और ‘ज़मीर’ !
‘भावुकता’ के ‘तन’ कसी, ‘सोने की जंजीर’ !!
‘रिश्ते–नाते-दोस्ती’, सब  से बढ़ कर ‘वित्त’ !
‘अपनों’ से बढ़ ‘स्वर्ण’ है, लगा उसी में ‘चित्त’ !!
बस ‘सिक्कों की खनक’ में, डूबे हैं ‘प्रेम-विमर्श’ !
लालच-‘मैली चमक’ से, ‘उन्हें’ हुआ है ‘हर्ष’ !!२!!



‘प्रेम’ हुआ ‘व्यापार’ सा, ‘दिल हो गये ‘दुकान’ |
‘धन की चोट’ से हो गये, दुर्बल हैं ‘मन-प्राण’ ||
‘श्रद्धा-आस्था’ हो गयीं, हैं कितनी ‘कमज़ोर’ |
‘कोष भक्ति का’’ चुर गया, घुसा ‘लोभ’ का ‘चोर’ ||
फँसा अज़ब ‘जंजाल’ में, सारा भारतवर्ष |
लालच-‘मैली चमक’ से, ‘उन्हें’ हुआ है ‘हर्ष’ !!३!!



About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

मेरे सभी ब्लोग्ज-

प्रसून

साहित्य प्रसून

गज़ल कुञ्ज

ज्वालामुखी

जलजला


  © Blogger template Shush by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP