Blogger द्वारा संचालित.

Followers

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (ढ)धरती का भार |(४)अति जनसंख्या-वृद्धि |

(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 

================ 
इस से कम होती सदा, ‘जन-गण-सुख-समृद्धि |

अच्छी होंती है नहीं, ‘अति जन-संख्या-वृद्धि’ ||
================================  
लोग अधिक साधन वही, घटती औसत आय |

सुविधायें सबको मिलें, होगा कौन उपाय ||

पूर्वजों की कर रही, ‘गुणन वृद्धि’ संतान |

पायें सब फिर किस तरह, ‘पूर्त्ति के सामान’ ||

मन-चाही कैसे मिले, हमें ‘लक्ष्य की सिद्धि’ |

अच्छी होंती है नहीं, ‘अति जन-संख्या-वृद्धि’ ||१||


कई धर्म, कुछ जातियाँ, करते बेढब होड़ |

‘दें जन-संख्या-वृद्धि में, सब को पीछे छोड़ ||

‘आबादी की डेग’ में, आया विकट उफ़ान’ |

अत: ‘नियन्त्रण’ में हुआ, बहुत अधिक व्यवधान |
 
रहे सभी की अब कहो, कैसे ‘स्थिर बुद्धि’ |

अच्छी होंती है नहीं, ‘अति जन-संख्या-वृद्धि’ ||२|

|

कैसे पायें सभी जन, भोजन, वसन, मकान |

‘जटिल समस्या’ का करें, अब किस तरह निदान ||

होता है जब साधनों, का अत्यधिक अभाव |

जीवन में यों व्यर्थ के, बढ़ाते कई तनाव ||

ऐसे में कैसे बढ़ें, सुज्ञान,विवेक-ऋद्धि

अच्छी होंती है नहीं, ‘अति जन-संख्या-वृद्धि’ ||३||

================================

 


मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (ढ)धरती का भार |(३)विनाश |

(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 
=======
सत्य-शिवोमय कल्पना, का हो गया विनाश |
‘अति जनसंख्या’ ने किया, ‘सुन्दरता’ का नाश ||
================================


मैला जल हर नदी का, मैला है हर ताल |
जल-विहार कैसे करें, सारस, बतख, मराल ||
बढ़ते वाहन उगलते, तीखी मैली गन्ध |
व्यर्थ इत्र का छिडकना, है इतनी दुर्गन्ध ||
मैली ‘धरती’ हो गयी, ‘मैला’ है ‘आकाश’ |
‘अति जनसंख्या’ ने किया, ‘सुन्दरता’ का नाश ||१||


डीज़ल औ पेट्रोल के, जलने से हर ओर |
प्राण-वायु कम हो गयी, बढ़ी ‘मलिनता’ घोर ||
‘प्रकृतिप्रिया की चल रही, घुटी घुटी सी साँस |
‘आकर्षण’ फीका पड़ा, धुँधला हुआ है हास ||
मैला सूरज-चाँद का उज्जवल-धवल प्रकाश |
‘अति जनसंख्या’ ने किया, ‘सुन्दरता’ का नाश ||२||


फैक्ट्री-वाहन कर रहे, इतना भीषण शोर |
अब ‘कर्कशता’ बाँटते, हम को ‘संध्या-भोर’ ||
“प्रसून” माँ की लोरियाँ, हैं कितनी बेजान |
‘घरघर-खटपट’ नाद से, कुण्ठित शिशु के कान ||
‘शान्ति-हिरणी’ फांसने, पड़ा ‘प्रदूषण-पाश’ |
‘अति जनसंख्या’ ने किया, ‘सुन्दरता’ का नाश ||३||

==================================
 



  


बुधवार, 27 नवंबर 2013

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (ढ)धरती का भार |(२)हमारी भूल |

सारे चित्र 'गूगल-खोज से साभार |
==========  
बिना खाद-पानी मिटे, हैं खुशियों के फूल |
देखो कितनी खल रही, हमें हमारी भूल !!
“””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””
यह आबादी देश की, बनी हुई अभिशाप |
‘अभाव’ से पीड़ित हुई, उगल रही है ‘पाप’ ||
सुखदायी होंती नहीं, ‘जनसंख्या-स्फीति’ |
इससे घटने लगी अब, है ‘आपस की प्रीति’ ||
सम्बन्धों के बाग में, उगने लगे ‘बबूल’ |
देखो कितनी खल रही, हमें हमारी भूल !!१!!

महँगी हैं सब सब्ज़ियाँ, महंगे आटा-डाल |
पैसे वाले भी दुखी, क्या खायें कंगाल ??
महँगे लकड़ी-कोयला, औ मिट्टी का तेल |
महँगा हर ईंधन हुआ, रहे सव्भी दुःख झेल ||
चिंताओं से हो रहे, सारे सुख निर्मूल |
देखो कितनी खल रही, हमें हमारी भूल !!२!!



“प्रसून” बागों में नहीं, ‘काँटे’ हैं भरपूर |
‘भँवरे-तितली’ प्यार के, चैन-अमन से दूर ||
जहाँ-तहाँ मुरझा गयी, ‘आशाओं की बेल’ |
बड़ा घिनौना झेलती, यह ‘आबादी’ खेल ||
‘सुविधाओं की पत्तियों’, पर है ‘दुविधा-धूल’ |
 देखो कितनी खल रही, हमें हमारी भूल !!३!!
“””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””   

About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

मेरे सभी ब्लोग्ज-

प्रसून

साहित्य प्रसून

गज़ल कुञ्ज

ज्वालामुखी

जलजला


  © Blogger template Shush by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP