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बुधवार, 4 दिसंबर 2013

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (ढ)धरती का भार |(४)अति जनसंख्या-वृद्धि |

(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 

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इस से कम होती सदा, ‘जन-गण-सुख-समृद्धि |

अच्छी होंती है नहीं, ‘अति जन-संख्या-वृद्धि’ ||
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लोग अधिक साधन वही, घटती औसत आय |

सुविधायें सबको मिलें, होगा कौन उपाय ||

पूर्वजों की कर रही, ‘गुणन वृद्धि’ संतान |

पायें सब फिर किस तरह, ‘पूर्त्ति के सामान’ ||

मन-चाही कैसे मिले, हमें ‘लक्ष्य की सिद्धि’ |

अच्छी होंती है नहीं, ‘अति जन-संख्या-वृद्धि’ ||१||


कई धर्म, कुछ जातियाँ, करते बेढब होड़ |

‘दें जन-संख्या-वृद्धि में, सब को पीछे छोड़ ||

‘आबादी की डेग’ में, आया विकट उफ़ान’ |

अत: ‘नियन्त्रण’ में हुआ, बहुत अधिक व्यवधान |
 
रहे सभी की अब कहो, कैसे ‘स्थिर बुद्धि’ |

अच्छी होंती है नहीं, ‘अति जन-संख्या-वृद्धि’ ||२|

|

कैसे पायें सभी जन, भोजन, वसन, मकान |

‘जटिल समस्या’ का करें, अब किस तरह निदान ||

होता है जब साधनों, का अत्यधिक अभाव |

जीवन में यों व्यर्थ के, बढ़ाते कई तनाव ||

ऐसे में कैसे बढ़ें, सुज्ञान,विवेक-ऋद्धि

अच्छी होंती है नहीं, ‘अति जन-संख्या-वृद्धि’ ||३||

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4 टिप्‍पणियां:

About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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