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सोमवार, 15 सितंबर 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य)(9) जोंक (ग) लक्कड़ हज़म-पत्थर हज़म |

(सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)
देखो ‘भारत की धरा’, रोई हो लाचार !
‘नाश’ रोक लो, बन्द कर, ‘शोषण’ का ‘बाज़ार’ !!
मोटे ‘अजगर’ की तरह, बैठे ‘माँ के लाल’ |
‘मेहनत’ के ‘धन’ से अधिक, छकें ‘मुफ़्त का माल’ ||
‘छोटे  नेता’ बड़ों  से,  सीखें  ‘चाल-फरेब’ |
‘भोली जनता’ ठग रहे, भरते  ‘अपनी  जेब’ ||
‘राष्ट्र वाद’ की ‘बीन’ के, ‘व्शिथिल’ हुये हैं ‘तार’ |
‘नाश’ रोक लो, बन्द कर, ‘शोषण’ का ‘बाज़ार’ !!१!!


बिना ‘सिफारिश-घूस’ के, कठिन हुये ‘व्यवसाय’ |
‘वेतन’ से ‘भारी’ बहुत, ‘नम्बर दो’ की ‘आय’ !!
‘लकड़ी-पत्थर-रेत’ को, खाकर हुये ‘निहाल’ !
‘लोहा-डीज़ल-शकर’ सब, लिये ‘पेट’ में डाल !!
‘मीठा-कड़वा-किरकिरा’, खा कर ली न ‘डकार’ !
‘नाश’ रोक लो,  बन्द कर, ‘शोषण’ का ’बाज़ार’ !!२!!


‘शक्ति-उपासक’ हैं कई, ज्यों ‘उपवन’ में शूल’ |
धमका कर  ‘चन्दा’  तथा, ‘हफ़्ता’ रहे वसूल ||
टैक्स  चुराने  में  निपुण, ‘शातिर’ कई ‘कुबेर’ !
‘लक्ष्मी-वाहन’  कर  रहे,  हैं  कितना ‘अन्धेर’ !!
केवल  ‘धन’  ही  पूजते,  भूल ‘ज्ञान का सार’ |
‘नाश’ रोक लो  बन्द कर, ‘शोषण’ का ‘बाज़ार’ !!३!!






2 टिप्‍पणियां:

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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