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गुरुवार, 18 सितंबर 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (10) ‘भट्टी-भ्रष्टाचार’(ख) ‘काँटों’ की ‘बाड़’ |

(सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)

जानें कितनी बार है, बदल चुकी सरकार !

ज्यों के त्यों ‘ज़िन्दा’ अभी, ‘चुभते भ्रष्टाचार !!

‘राजनीति’ के ‘खेल’ में, पनपा है ‘छल’ आज |

जनता ‘चिड़िया’ बन गयी, नेता हैं कुछ ‘बाज’ ||

‘भ्रष्ट तन्त्र’ को दे दिया, ‘प्रजातन्त्र’ का ‘नाम’ |

इस ‘काँटों’ की ‘बाड़’ ने,  ‘चुभते’  दिये ‘इनाम’ ||

मिले ‘राज्य’ से बीच में, छिन जाते अधिकार |

ज्यों के त्यों ‘ज़िन्दा’ अभी, ‘चुभते भ्रष्टाचार’ !!१!!

कुछ ‘पैसों’ के लिये हम, बेच रहे ‘ईमान’ !

‘राष्ट्र-भक्ति’ के नाम पर, देते हैं ‘व्याख्यान !!

‘चतुराई’ से भर रहे, अपने घर में ‘कैश’ |

‘जनता के श्रम’ से अरे, लूट रहे वे ‘ऐश’ !!

 ‘धनवादी सिद्धान्त’ के,  हुये कई ‘बीमार’ |

ज्यों के त्यों ‘ज़िन्दा’ अभी, ‘चुभते भ्रष्टाचार’ !!२!!
‘लोभ’ हुआ ‘ख्ब्बीस’ सा, ‘तृष्णा’ निठुर ‘चुड़ैल’ !

दोनों मिल कर खेलते, ‘नाश-कबड्डी-खेल !!

इनसे उपजे ‘कमीशन’-घूस औ धूर्त ‘दहेज़’ !

इन से ‘अच्छे लोग’ भी, करते अब न ‘गुरेज़’ !!

है ‘भारत’’ पर ‘भार’ सा, इनका हर ‘व्यहवार’ !

ज्यों के त्यों ‘ज़िन्दा’ अभी, ‘चुभते भ्रष्टाचार’ !!३!!

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About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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