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बुधवार, 2 जुलाई 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (२)सरस्वती-वन्दना (ग)‘काव्यांग-समंजन’(i)करो मुझे तुम धन्य !

आकर्षित सब को करे, ‘काव्य-कला-सौजन्य’ !
हे माँ ! मुझ पर कृपा कर, करो मुझे तुम धन्य !!
शब्द-अर्थ’ से सजें माँ, कविताओं के अंग !
‘अलंकार’ सब तरह के, भरते रहें ‘उमंग’ !!
लदे न इतना भी अधिक, ‘अलंकार’ का ‘बोझ’ !
जिससे दब जाये अधिक, ‘कविताओं’ का ‘ओज’ !!
और इस तरह ‘काव्य’ हो, रोचकता-सम्पन्न !
हे माँ ! मुझ पर कृपा कर, करो मुझे तुम धन्य !!१!!


माँ ! ‘माधुर्य-प्रसाद’ औ, ‘ओज’-‘तीन गुण’-सिद्ध !
‘परुषा-गौड़ी-कोमला’, ‘तीन वृत्ति’-समृद्ध ||
और ‘कला’ के साथ में, ‘भाव’ रहे भरपूर !
तथा ‘’कल्पना’ भी रहे, मत ‘यथार्थ’ से दूर !!
पढेँ, सुनें जो ‘काव्य’ को, होते रहें प्रसन्न !
हे माँ ! मुझ पर कृपा कर, करो मुझे तुम धन्य !!२!!
‘रोचकता’ के साथ में, बने रहें ‘आदर्श’ !
‘विमर्श’ हों इस तरह से, मिटें न मन के ‘हर्ष’ !!
विधा ‘काव्य-साहित्य’ की, हो विचार-अनुकूल !
‘नौका-साधन’ विधा है, मुख्य ‘साध्य-नद-कूल’ ||
सभी पढेँ जो ‘काव्य’ को, हों न कभी भी खिन्न !
हे माँ ! मुझ पर कृपा कर, करो मुझे तुम धन्य !!३!!

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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