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गुरुवार, 17 जुलाई 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (4) राष्ट्र-वन्दना (ख) तुम माता-तुम ही पिता !


सच कहता हूँ, नहीं है, मिथ्या  इस में ‘लेश’ !
तुम ‘माता’,तुम ही ‘पिता’, हे मेरे ‘प्रिय देश’ !!
खा कर पुष्ट ‘शरीर’ है, तुम से पाकर ‘अन्न’ |
‘गोद’ तुम्हारी मिली जो, खेले, रहे ‘प्रसन्न’ ||
‘प्यास’ बुझाई, जब लगी, पीकर ‘शीतल नीर’ |
तुमने हमको दिया जो, अर्पित तुम्हें ‘शरीर’ ||
जो चाहा, तुमसे मिला, रहा न कुछ भी ‘शेष’
तुम माता,तुम ही ‘पिता’, हे मेरे ‘प्रिय देश’ !!१!!
काम तुम्हारे आ सके, ‘हाड़’-‘मांस’ या ‘चर्म’’ |
तभी ‘पूर्ण’ हो सकेगा, मेरा ‘जीवन-धर्म’ ||
‘रूप’ तुम्हारा यत्न से, राखें सदा ‘सँवार’ |
इसमें पनपें मत कभी, अब कुछ ‘विषम विकार’ !!
‘अमन-चैन’ से भरा हो ‘सामाजिक परिवेश’ !
तुम माता,तुम ही ‘पिता’, हे मेरे ‘प्रिय देश’ !!२!!
‘अनेकता’ में ‘एकता’, आज तुम्हारा ‘मन्त्र’ |
प्रयास ‘पुरखों’ ने किये, तब तुम हुये ‘स्वतंत्र’ ||
‘टूटी माला’ फिर जुड़े, ऐसे हों ‘आयास’ !
सभी नागरिक ‘एकजुट’, होकर करें ‘विकास’ ||
कभी ‘आपसी फूट’ का, मत हो सके ‘प्रवेश’ !
तुम माता,तुम ही ‘पिता’, हे मेरे ‘प्रिय देश’ !!३’!!

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (19-07-2014) को "संस्कृत का विरोध संस्कृत के देश में" (चर्चा मंच-1679) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. बढ़िया प्रस्तुति-
    आभार आपका

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर भावना मय लेखन, काश देश का हर नागरिक ऐसा सोचे

    उत्तर देंहटाएं

About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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