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मंगलवार, 15 जुलाई 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (4) राष्ट्र-वन्दना (क)‘(राष्ट्र’ ! ‘समष्टि-ब्रह्म’ तू !)

(सारे चित्र 'गूगल-खोज'से साभार)
‘राष्ट्र’ ! ‘समष्टि-ब्रह्म’ तू, ‘पूज्य’ जैसे ‘ईश’ |

तुझको ‘कोटि प्रणाम’ हैं, ‘विनत’ झुका कर ‘शीश’ ||

भौगोलिक परि‘वेश’ है, तेरा ‘सौम्य शरीर’ |

नदियाँ ‘रक्त-प्रवाहिनी’, ‘रुधिर’ सु-पावन ‘नीर’||

‘वायु’ तेरे ‘प्राण’ हैं, और ‘पवन’ है ‘साँस’ |

‘संस्कृति’ तेरी ‘आत्मा’, मय ‘आस्था-विश्वास’ ||

वैचारिक सिद्धान्त’ ‘मन’, ‘मस्तक’ उच्च ‘गिरीश’ |

तुझको ‘कोटि प्रणाम’ हैं, ‘विनत’ झुका कर ‘शीश’ ||१||


मन में ‘आशा-ज्योति’ भर, ‘अन्धकार’ को छाँट !!

जगत-गुरु’ तू रहा है, मेरे भारत-देश !

तूने दिया ‘अतीत’ में, ‘जग’ को ‘’नव सन्देश’ ||

ज्यों ‘रजनी’ को दे ‘सुखद’, ‘धवल-कान्ति’ रजनीश ||

तुझको ‘कोटि प्रणाम’ हैं, ‘विनत’ झुका कर ‘शीश’ ||२||


होकर विशुद्ध ‘ह्रदय-मन’, ‘अहंकार’ को मेट |

अर्पित सेवा में करूँ, में ‘काव्य’ की ‘भेंट’ ||

तेरे ‘प्रेरण’ से भरें, मेरे ‘मुक्त विचार’ |

‘जन-जन’ में ये कर सकें, ‘ऊर्जा’ का ‘संचार’ ||

दे “प्रसून” को ‘राष्ट्र-प्रभु’, अपना यह ‘आशीष’ |

तुझको ‘कोटि प्रणाम’ हैं, ‘विनत’ झुका कर ‘शीश’ ||३||


4 टिप्‍पणियां:

About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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