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रविवार, 6 जुलाई 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (3)गुरु-वन्दना (क) हे ईश्वर तुम स्वयं गुरु !

(तीन चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 


हे ईश्वर तुम ही मिले, ले कर ‘गुरु’ का ‘रूप’ !
गुरु ! तुम्हारी शक्तिहै, जग में परम ‘अनूप’ !!
बिना तुम्हारे विश्व में, कौन हमारे साथ ?
दो आशीष मुझे प्रभु, रख कर सर पर साथ !!
जिस पर गुरु का हाथ हो, होता वह निष्पाप |
उस का तीनो शूलका, मिट जाता सन्ताप ||
ज्यों  छाता ‘छाया’ करे, हरे जेठ की धूप’ ||
गुरु ! तुम्हारी शक्तिहैजग में परम अनूप !!!!

चाल कुचालीचल चुका, हे गुरु, काल-कुचक्र!
सारे भारत पर पड़ी, दृष्टि नियतिकी वक्र ||
प्रभु ! तुम ही तो राष्ट्रहो, तुम ही अखिल समाज !
इस समाज को ग्रस लिया, ‘कर्क रोगने आज ||
कड़वा काव्यनीम सा, है औषधि स्वरूप |
गुरु ! तुम्हारी शक्तिहैजग में परम अनूप !!!!



यद्यपि लगती है बुरी, पीड़ा’ देती ‘चोट’ |
पर कुम्हारकी ‘चोट’ से, घटते घटके ‘खोट’ ||
हिलते जब जब ‘चोट’ से, हैं वीणाके तार |
उपजा करती है तभी, ‘मधुर मधुर झंकार’ ||
और हाथ की ‘चोट’ से, अन्नफटकता  सूप’ |
गुरु ! तुम्हारी शक्तिहैजग में परम अनूप !!!!







3 टिप्‍पणियां:

  1. भाव और अर्थ दोनों में सटीक सशक्त स्तुति गुरु दोहावली।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह वाह
    उम्दा रचना
    भावपूर्ण अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं

About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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