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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (१)ईश्वर-वन्दना(च)मेरे कृपा-निधान !


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‘तुम’ में ‘सब’, ‘सब’ में ‘तुम्हीं, मेरे कृपा-निधान !
तुम ‘प्रभु’, तुम ‘परमात्मा’, हो तुम्हीं ‘भगवान’ ||


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तुम ‘अनाम’ हो किन्तु हैं, कोटि तुम्हारे ‘नाम’ |
‘रोम-रोम’ से है तुम्हें, मेरे ‘ईश’ प्रणाम ||
तुम उस की हर ‘दशा’ में, सुनते हो फ़रियाद |
‘निष्ठा-श्रद्धा-आस्था’, सेम जो करता ‘याद’ ||
‘राजा’ या ‘कंगाल’ सब, तुमको एक सामान |
तुम ‘प्रभु’, तुम ‘परमात्मा’, हो तुम्हीं ‘भगवान’ ||१||


तुम ‘निकेत’ से रहित हो, यहाँ-वहाँ, हर ‘ठाँव’ |
एक बराबर हैं तुम्हें, ‘तची धूप’ या ‘छाँव’ ||
‘पूजा-घर’ से तुम्हें क्या, ‘मन्दिर’ से क्या ‘काम’ ?
जिस ‘दिल’ में हो ‘प्रेम’ बस, वहीं तुम्हारा ‘धाम’ ||
एक बराबर हैं तुम्हें, ‘राज-भवन’-श्मशान’ |
तुम ‘प्रभु’, तुम ‘परमात्मा’, हो तुम्हीं ‘भगवान’ ||२||


तुम ‘हो’, तुम ‘नहीं’ भी, तुम ‘अरूप’-‘बहुरूप’ |
सब के प्रति ‘समभाव’ तुम, क्या ‘दरिद्र’ क्या ‘भूप’ !!
तुम्हें ‘भूख’ या ‘प्यास’ से, नहीं तनिक भी ‘काम’ |
पर आरपित हर ‘भोग’ में, ‘रमते’ मेरे ‘राम’ ||
फिर ‘रूखी’ हो या ‘सरस. ‘पकवान-मिष्ठान’ |
तुम ‘प्रभु’, तुम ‘परमात्मा’, हो तुम्हीं ‘भगवान’ ||३||



3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर भक्तिमय दोहे गीत .पढ़कर आनंदआ गया
    latest post प्रिया का एहसास

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (17-02-2014) को "पथिक गलत न था " (चर्चा मंच 1526) पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं

About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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