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सोमवार, 9 दिसंबर 2013

नयी करवट (दोहा-ग़ज़लों पर एक काव्य ) (छ) बदलाव (१)आम आदमी {(आप(आमआदमीपार्टी/ अरविंद केजरीवाल की दिल्ली में शानदार विजय के उपलक्ष्य में )}

 मित्रों ! राजनीति न तो मेरी रुच का केन्द्र है ,न ही मेरी सोच का स्वाद |पर दिल्ली के चुनाव ने यह तो सिद्ध कर ही दिया है के, जनता बदलाव चाहती है तथा कुछ नयी की तलाश है उसे | वह हर नए 'राजनीति-योद्धा'में एक मसीहा की-एक अवतार' की जो उसे 'वर्तमान' की सडांध भरी दलदल से उबार सके |
०सारे चित्र 'गूगल-खोज' से)


(आप(आमआदमीपार्टी/ अरविंद केजरीवाल की दिल्ली में शानदार विजय के उपलक्ष्य में )

भारत के ‘दिल’ में बसे, ‘आम आदमी’ आज |
पोंछ के आँसू फिर हँसे, ‘आम आदमी’ आज ||
राजनीति के क्षेत्र में, पनपी अच्छी सोच |
‘लीक’ छोड़ कर कुछ हटे, ‘आम आदमी’ आज ||
‘दल-दल’ भी अच्छी लगे, माना रही मलीन |
‘नीरज’ बन कर यदि लसे, ‘आम आदमी’ आज ||
कूटनीति में हो अगर, मक्कारी की छाप |
मत अपनाए तब उसे, ‘आम आदमी’ आज ||
ला सकता है फिर नये, अच्छे कुछ बदलाव
कमर, इरादा कर कसे, ‘आम आदमी’ आज ||
‘उम्मीदों के बाग’ में, खिल कर हँसें ‘प्रसून” |
यही चाहता ‘आप’ से, ‘आम आदमी’ आज ||


7 टिप्‍पणियां:

  1. लेना देना जब नहीं, करे तंत्र को बांस |
    लोकसभा में आप की, मानो सीट पचास |

    मानो सीट पचास, इलेक्शन होय दुबारे |
    करके अरबों नाश, आम पब्लिक को मारे |

    अड़ियल टट्टू आप, अकेले नैया खेना |
    सबको माने चोर, समर्थन ले ना दे ना ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  3. लाजवाब ... आमीन ... आम आदमी की ही बन के रहे आप ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर...उम्मीद कायम रहे...

    उत्तर देंहटाएं
  5. के उपलक्ष्य में )

    भारत के ‘दिल’ में बसे, ‘आम आदमी’ आज |
    पोंछ के आँसू फिर हँसे, ‘आम आदमी’ आज ||
    राजनीति के क्षेत्र में, पनपी अच्छी सोच |
    ‘लीक’ छोड़ कर कुछ हटे, ‘आम आदमी’ आज ||
    ‘दल-दल’ भी अच्छी लगे, माना रही मलीन |
    ‘नीरज’ बन कर यदि लसे, ‘आम आदमी’ आज ||
    कूटनीति में हो अगर, मक्कारी की छाप |
    मत अपनाए तब उसे, ‘आम आदमी’ आज ||
    ला सकता है फिर नये, अच्छे कुछ बदलाव
    कमर, इरादा कर कसे, ‘आम आदमी’ आज ||
    ‘उम्मीदों के बाग’ में, खिल कर हँसें ‘प्रसून” |
    यही चाहता ‘आप’ से, ‘आम आदमी’ आज ||

    सशक्त प्रासंगिक रचना। बदलाव की बयार लिए।

    उत्तर देंहटाएं

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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