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रविवार, 22 दिसंबर 2013

नयी करवट (दोहा-ग़ज़लों पर एक काव्य )(६)ढोल की पोल(ख)पेटू पीर



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यह सच है कुछ ‘सन्त’ हैं, सच्चे कई ‘फ़कीर’ |

‘आमिल-कामिल’ भी छुपे, होंगे ‘असली पीर’ ||


सच्चे ‘आशिक़’ खुदा के,साधू कई ‘अलमस्त’ |

खाते ‘रूखी रोटियाँ’, पीते ‘ठंडा नीर’ ||

अपने मन को जीत कर, जीते होकर ‘शान्त’ |

देख ‘पराये माल’ को, होते नहीं ‘अधीर’ ||


सचमुच ‘सच्चे नाम’ का, लेते जो ‘आनन्द’ |

पर इनकी ही ‘आड़’ में, पनपे ‘पेटू पीर’ ||


इनका ‘पल्लू’ पकड़ कर, ठगते कुछ ‘ठग’ आज |

पैने ‘तीरों में कई, रक्खे ‘गुठ्ठल तीर’ ||


‘प्रसून” ‘सच्चे ज्ञान’ की, यदि तुम को है ‘प्यास’ |

ढूँढो ज्ञानी सन्त कुछ, करके कुछ ‘तदवीर’ ||


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 मेरे ब्लॉग 'प्रसून' पर 'घनाक्षरी-वाटिका' पंचम कुञ्ज (गीता-गुण-गान) में आप का स्वागत है !   

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (23-12-13) को "प्राकृतिक उद्देश्य...खामोश गुजारिश" (चर्चा मंच : अंक - 1470) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह जी वाह ... बहुत सुन्दर ...

    उत्तर देंहटाएं

About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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