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शनिवार, 24 अगस्त 2013

जय कन्हैया लाल की ! (कुछ सामयिक शर्मनाक घटनाओं पर आधारित व्याजोक्तियाँ ) (क) जय कन्हैया लाल की !

आज लंबी अवधि के बाद इंटरनेट की सुविधा पुन; उपलब्ध होने पर उपस्थित हूँ |  एक ' कपट-साधु' की  काली करतूतों के समाचारों से मन में उठी व्यथा पेश है |
(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार )



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जय कन्हैया लाल की !
जय कन्हैया लाल की !!
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‘पत्थर-दिल’, ‘पत्थर’ को छप्पन-भोग लगाते हैं |
भूखे नंगे लोगों को, तिल-तिल तरसाते हैं || 
बन कर ‘कान्हां’, ‘चैन की वंशी’ रोज़ बजाते हैं |
कोई ‘सुदामा’ द्वारे आये, उसे भगाते हैं ||
‘सारी दुनियाँ’ है बलिहारी, इन की ‘उल्टी चाल’ की |
जय कन्हैया लाल की !
जय कन्हैया लाल की !!१!!
‘तिलक वैष्णवी’ माथे, छुप कर मदिरा पीते हैं |
‘कण्ठी-माला’ पहन, ‘ऐश’ में डूबे जीते हैं ||
सिर पर ‘बोझ पोथियों का, ‘ज्ञान से रीते हैं |
इन मन में लोभ से ‘तचते, जले पलीते’ हैं |
‘भजन-ध्यान’ में बैठे लेकिन, चिन्ता इन को ‘माल’ की |
जय कन्हैया लाल की !
जय कन्हैया लाल की !!२!!


देते हैं ‘उपदेश’ सभा में, ‘प्रवचन’ करते हैं |
‘कथा’ वांचते, ‘रकम’ ऐंठतें, ‘जेबें’ भरते हैं ||
‘रूप की मछली’ देख के, ‘बगुले’ उस पर मरते हैं |
अवसर देख के ‘शील’ लूटते, तनिक न डरते हैं ||
‘धर्मों की गद्दी’ पर बैठे, घोर ‘नारकी-पातकी’ |
जय कन्हैया लाल की !
जय कन्हैया लाल की !!३!!


महाप्रभू चैतन्यदेव की ‘बात’ न इन में है |
ज्ञानेश्वर का ज्ञान न, ‘प्रसिद्धि’, पर जन-जन में है ||
‘मुहँ में राम, बगल में छुरियाँ’, लालच मन में है |      
‘मन्त्रों’ का उच्चारण करते, ध्यान तो ‘धन’ में है ||
भूल गये अपने ‘पुरखों’ को देखो ये ‘कुल-घालकी’ |
जय कन्हैया लाल की !
जय कन्हैया लाल की !!४!!
हम समझे बेदाग़ उन्हें जो मैले ‘दागों’ में |
बनते हैं ‘वैरागी’ लेकिन डूबे ‘रागों’ में ||
‘कपट-“प्रसून” खिले हैं इन के ‘बागों में |
लगते हैं ‘सरनाम’, विषैले ‘पाप के नागों’ में ||
दिल से ‘काले कौवे’ जिन को, काया मिली ‘मराल’ की |
जय कन्हैया लाल की !
जय कन्हैया लाल की !!५!!


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4 टिप्‍पणियां:

  1. इनके लिए आपनें धर्मों की गद्दी’ पर बैठे, घोर ‘नारकी-पातकी सही कहा है ! आज का संत समाज अपनें कर्तव्यों से पूर्णतया विमुख हो चूका है !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. आक्रोश साझा करने के लिए आभार-
    शुभकामनायें- आदरणीय-

    उत्तर देंहटाएं
  3. धर्म के ठेकेदारों ने धर्म को अब एक कंचन- कामिनी का फलता फूलता व्यवसाय बना लिया लिया है .उसी सच को उकेरती सटीक रचना.
    latest post आभार !
    latest post देश किधर जा रहा है ?

    उत्तर देंहटाएं

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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