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रविवार, 11 अगस्त 2013

मंगल-गीत (४) मंगल-गीत’ हमारे |


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दशा देश की बिगड़ी है जो, आकर ‘नियति’ सुधारे |
स्वर पहुँचें, ईश्वर तक गूँजें, ‘मंगल-गीत’ हमारे ||
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मत माफियों से मिले देश के किसी प्रान्त की सत्ता |
और ‘सियासत’ बने जुवे का नहीं ‘ताश का पत्ता’ ||
‘कूट-नीति बेईमानों की’ मत ‘ईमान’ को मारे |
स्वर पहुँचें, ईश्वर तक गूँजें, ‘मंगल-गीत’ हमारे ||१||

कहीं कोई ‘समुदाय’, ‘धर्म’ का ‘झूठा राग’ न गाये |
मत जनता में ‘स्म्प्रदायवादों’ की ‘आग’ लगाये ||
‘नया जागरण’, प्रजातंत्र’ का विकृत रूप सँवारे |
स्वर पहुँचें, ईश्वर तक गूँजें, ‘मंगल-गीत’ हमारे ||२||

‘प्रान्तवाद’ की ‘क्षेत्रवाद’ की आँच कहीं मत आये |
‘जातिवाद का रोग’ किसी के मन को अब न सताये ||
‘अखण्डता का चमन अमन का’, कहीं न कोई उजारे |
स्वर पहुँचें, ईश्वर तक गूँजें, ‘मंगल-गीत’ हमारे ||३||

रहा ‘गुलामी के रोगों’ से, पीड़ित ‘वतन का तन’ है |
त्यागी वैरागी वीरों ने, ‘मुक्ति’ का किया जतन है ||
अब ‘अनीति का नाग’ पातकी,  इस में ‘विष’ न उतारे |
स्वर पहुँचें, ईश्वर तक गूँजें, ‘मंगल-गीत’ हमारे ||४||

“प्रसून” सारे रंग विरंगे, एक बाग में खिलते |
अलग अलग ‘गन्धों के सुख’ हैं, इन से सब को मिलते ||
‘भेद-भाव का शूकर’, सुमन-पादपों को न उखारे |
स्वर पहुँचें, ईश्वर तक गूँजें, ‘मंगल-गीत’ हमारे ||५||
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4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर और सार्थक प्रस्तुती,आभार।

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    उत्तर
    1. धन्यवाद! बहुत शीघ्र ही मंगल-गीतों की श्रृंखला का समापन कर के दूसरी ज्वलंत समस्या मूलक रचना-माला आप की सेवा मे ले कर उपस्थित हूंगे |

      हटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल मंगलवार (13-08-2013) को "टोपी रे टोपी तेरा रंग कैसा ..." (चर्चा मंच-अंकः1236) पर भी होगा!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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