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शनिवार, 25 मई 2013

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (ड) मीनार(विकास की खोखली ऊंचाई ) (३) शिक्षित अविद्या |


  संस्कृत में एक श्लोक 'चाणक्य-नीति'/भर्तृहरिनीति में है-'दुर्जन: परिहर्तव्य: विद्या  लंकृटापि सन्, मणिना भूशितो सर्प: किमसौ न भयंकर:' अर्थात विद्या से सजा हुआ भी दुष्ट त्यागने योग्य ही होता है | विद्या जो विनाश करे, वह अविद्या ही है |दीपक जो आग लगाये तो अभिशाप है | सुशिक्षित लोग व्यभिचार,भ्रष्टाचार अनाचार अत्याचार करें तो उन की विद्या भी अविद्या ही है | यह सर्ग केवल नारी पर विषयित नहीं है | हाँ 'नारी-उत्पीडन' के कुछ अंश दोहराए गये हैं | 
(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)       
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‘चाँद’ से आगे बढ़ गया, ‘ज्ञान और विज्ञान’ |
किन्तु सुशिक्षित लोग भी,रचते ‘नाश-विधान’ ||
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लोभी,  लम्पट, धूर्त जन,  कर  ‘दहेज़’  की  माँग |
’मधुरिम  मानव-प्रेम’  में,  लगा  रहे  हैं  ‘आग’ ||
जुवा  खेल, धन  उड़ा  कर,  करते  ‘मदिरा-पान’ |
कुछ  जन  पत्नी,  सुता - माँ,  करते  अपमान ||
ये  ‘भारत  की  संस्कृति’,  से  हो कर  अनजान |
ऐसे शिक्षित लोग भी, रचते  ‘नाश-विधान’ ||१||

 
कभी ‘प्रगति’ के नाम  पर,  कर  नारी को  नग्न |
कामुक-लोलुप नज़र’  से,  देख  देख  हो  मग्न  ||
‘अंग - प्रदर्शन’  के  लिये,  करते  ‘नये  प्रयोग’ |
देख  ‘नग्नता’  घूमते,  ‘तन  के  लोलुप’  लोग ||
‘खड्ग’ न बदली  है  वही,  बदली  केवल ‘म्यान’ |
निज चरित्र का  हनन कर, रचते ‘नाश-विधान’ ||२||


‘स्नेह-ओज-गुण-खान’  है,  हर  नारी  का  ‘रूप’ |
‘स्त्री-धन’  संसार   में,   होता  परम   ‘अनूप’ ||
अब  तक  तो ‘इतिहास’  ने, की  है  ‘भारी भूल’ |
नर  नारी  को  मानते,  रहे  ‘चरण  की  धूल’ ||
‘वैज्ञानिक - युग’  में सुलभ,  है ‘नारी - सम्मान’ |
पर  नर  उस  को दर्द  दे, रचते ‘नाश-विधान’ ||३||
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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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