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गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (ट) ‘मानवीय पशुता’ |(३) ह्रदय-जाल |


ग्रन्थ के क्रम में प्रकाशित इस रचना में  'अतिवासना'(hypolust) या  अति यौन-तृष्णा9hyposex) के कारणों- विदेशी आहार जो यहाँ के भौतिक वातावरण के अनुकूल नहीं है, धन का मद और ' नग्नवाद' की कुसंस्कृति का प्रभाव आदि पर प्रकाश डाला गया है |  गुंडागीरी आदि सभी विघटनकारी तत्व इन्हीं कारणों से हैं |
बहु कुचार्चित शील हरण और बलात्कार- नारी अपहरान्या अप्राकृतिक यौन-  सम्बन्ध इन्हीं कारणों  से  हो रहे हैं और यौन-अप्पराध भी इन्हीं सब की देंन हैं \प्रत्येक देश का परिधान ९कम या अधिक ) वहाँ के 'भौगोलिक वातावरण पर निर्भर करता है | दूसरे देशॉन में अनुकूल हो भी सकता है और नहीं भी |      

(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)

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तन  के  ‘आधे आवरण’,  देखो  दिये  उतार !

हुआ ‘शील का आभरण’. ‘रूप का खुला बज़ार’ ||


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इन  वस्त्रों  को  देखिये, क्या  ही  अजब  कमाल |

‘ह्रदय’  फांसने  के  लिये,  बने  हुये  ये  ‘जाल ||

शायद  कोई  भी जगह,  तन  की  रही  न  शेष |

जिसे  ढांकने  में  सफल,  ‘कामिनियों  के  वेश’ ||

‘लाज’  के  ‘पोषण’  में   रहे,   बेचारे   ‘लाचार’ |

हुआ  ‘शील का आभरण’. ‘रूप का खुला बज़ार’ ||१||



इन  वस्त्रों  को  देख कर,  जागी   ‘सोई आग’ |

सोई  सोई  ‘काम’  की,  गयी  ‘कामना’  जाग  ||

‘इच्छाओं’ में  ‘भोग’  का,  भरने  लगा  है  ‘ताप’ |

इसी  लिये  ‘अनुराग’  को,  जला  रहा  ‘संताप’ ||

और  ‘वासना-जलधि’  में,  आने लगा  है ‘ज्वार’  |

हुआ  ‘शील का आभरण’. ‘रूप का खुला बज़ार’ ||२||



वस्त्र  ‘सभ्यता’  के  सदा,  से  हैं  रहे  ‘प्रतीक’  |

शायद  इन्हें  उतार कर,  हम न  कर  रहे  ठीक ||

तन   ढँकने  के  लिये  हैं,  हमने  पहने  वस्त्र  |

‘काम-युद्ध’ के हित  इन्हें,  बना रहे  क्यों  ‘अस्त्र’ ||

क्यों दिखलाते  ‘गुप्त कुछ’,  ‘तन के चाप’  उभार |

हुआ  ‘शील का आभरण’. ‘रूप का खुला बज़ार’ ||३||


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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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