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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (ट) ‘मानवीय पशुता’ |(४) काम-पाश |


इस रचना में 

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‘मन-सु-गगन’  में  ‘काम-घन, उठे ‘निरंकुश’  आज |
जगी  ‘वासना की तड़ित’,  पशुवत ‘मनुज-समाज’ ||


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तज कर ‘सात्विक भोज’  को, ‘अति तामस आहार’ |
अधिक मद्य  पी  मद-भरे, ‘पशुओं’  से व्यवहार  ||


‘कामोत्तेजक चित्र’  लख ,   उठा   ‘वासना-ज्वार’ |
फिर  ‘संयम के बाँध’  की,  टूट   गयी   ‘दीवार’ ||


‘भोली चिड़ियाँ’  ढूँढते,  ‘कामी जन’  बन  ‘बाज’  |
जगी ‘वासना की तड़ित’, पशुवत ‘मनुज-समाज’ ||१||
 ‘मर्यादा से  हीन पशु’,  बन  कर   करे   शिकार |
‘मानवता’   में   पनपते,   ‘जंगल   के  आचार’ ||


‘छल-बल-कपट के दाँव’  से,  करते  ‘कामुक घात’ |
‘शील’ पे  करते  ‘आक्रमण’,  रच ‘कामी  उत्पात’ ||
‘धन’-‘जन-मत’ या ‘प्रबल तन’, का  है ‘ऐसा  राज’ |
जगी ‘वासना की तड़ित’, पशुवत ‘मनुज-समाज’ ||२||



 

फ़ुसलाकर,  दे  लोभ  कुछ,  डाल  ‘कामके पाश’ |
‘नन्हें   पँछी  प्यार   के’,   ‘धूर्त’   लेते   फांस ||
कुछ  ‘उलूक-सूत’   ढूँढ  कर,  ‘कुमारियाँ मजबूर’  |
‘भूखी - प्यासी  विवशता’,  करें   ‘भोग’   भरपूर ||


‘सम्विधान’  रख  ‘ताख’  में,  लूटें  ‘ललना-लाज’ |
जगी ‘वासना की तड़ित’, पशुवत ‘मनुज-समाज’ ||३||


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1 टिप्पणी:

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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