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शनिवार, 23 मार्च 2013

होली आने वाली है -(दो गीत)(होली से पूर्व विशेष)



  (अधिकांश चित्र 'गूगल-खोज' से साभार ) 
(अ)            दुनियावी |
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चारों ओर बहार, होली आने वाली है ||
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झूम उठे होलियार, होली आने वाली है |
चारों ओर बहार, होली आने वाली है || ===========================
‘पतझर’ से लड़ ‘बसन्त’ जीता |
‘मायूसी का मौसम’ बीता ||
‘मदन’ और ‘रति’ का ‘रस’ सब में-
ना कोई ‘यौवन-घट’ रीता ||
‘नेह’-पगे ‘सजनी-साँवरिया’-
करते नयना चार, होली आने वाली है ||
चारों ओर बहार, होली आने वाली है ||१||


कहीं उचित एकान्त पा कर |
सारे जग से नज़र चुरा कर ||
अकुलाई है ‘पिया मिलन’ को-
कुछ शरमाकर, कुछ सकुचा कर ||
देख के प्रियतम, धीरज खो कर-
बढ़ती बाँह पसार, होली आने वाली है |
चारों ओर बहार, होली आने वाली है ||२||



लज्जा त्यागी हर क्षण, हर पल |
कुछ ‘मर्यादित’, कुछ ‘उच्छृंखल’ ||
लिये ‘हिलोरें’ ‘तट’ से मिलने-
‘बाढ़ की नदिया’ सा मन व्याकुल ||
बेकाबू हो बढ़े ‘प्रिय’-‘प्रिया’-
करने को अभिसार, होली आने वाली है |
चारों ओर बहार, होली आने वाली है ||३||


“प्रसून” मन लेता अंगड़ाई |
है ‘चाहों’ ने पींग बढ़ाई ||
‘नीरसता’, में ‘रस’ भरने की-
इच्छा जागी रामदुहाई ||
दिल में ‘सोई प्रीति’ जगाऊँ-
नया करूँ ‘संसार’, होली आने वाली है |
चारों ओर बहार, होली आने वाली है ||४||

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(ब) प्राकृतिक |
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है सुन्दर संसार, होली आने वाली है ||

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बीत गया पतझार, होली आने वाली है |
है सुन्दर संसार, होली आने वाली है ||
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थिरक थिरक कर नाची तितली |
कुहुक उठी कोयलिया पगली ||
‘पृकृति-प्रिया’ सज धज कर निकली |
‘बसन्त’ से मिलने को मचली ||
कोंपल, कली, कुसुम से सज्जित-
कर सोलह श्रृंगार,होली आने वाली है |
है सुन्दर संसार, होली आने वाली है ||१||

 


बागों में सुन्दर ‘अमराई’-
की डाली डाली इतराई ||
चिल छबीली ‘मद-रस’-भीनी-
मस्ती में भर कर बौरायी ||
आकर्षक चम्पई बौर के,
 पा कर के उपहार, होली आने वाली है |
है सुन्दर संसार, होली आने वाली है ||२||


कर के ‘रूप-स्वरस’ का संचय |
बने ठने मानों ‘रूपालय’ ||
नये नये परिधानों जैसे-
पहने हैं ‘पेड़ों’ ने ‘किसलय’ |
‘यौवन-कलश’ में मानों रसमय-
छलक उठा हो ‘प्यार’, होली आने वाली है |
है सुन्दर संसार, होली आने वाली है ||३||


हँसे “प्रसून”, चटकतीं ‘कलियाँ’ |
महक उठीं बागों की गालियाँ ||
 गगन से उतरीं ‘परियों’ जैसी-
नाचीं-थिरकीं सभी ‘तितलियाँ’ ||
कानों में ‘रस’ घोल रहे हैं-
‘भ्रमरों के गुंजार’, होली आने वाली है |
है सुन्दर संसार, होली आने वाली है ||४||




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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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