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बुधवार, 20 मार्च 2013

गौरैया (गौरैया-दिवस पर विशेष) (ब्याजोक्ति )


कल गौरैया-दिवस पर , कम्पूटर- तन्त्र सही न होने के कारण आज प्रकाशित - 
(चित्र 'गूगल-खोज' से साभार )

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कितनी चंचल और चुलबुली गौरैया !

हम को कितनी लगी है भली गौरैया !!



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जाने कहाँ कहाँ से उड़ कर आती है !

आँगन में जो कुछ मिलता खा जाती है ||

पड़ी किसी नज़र, बड़ी चौकन्नी हो-

चोंच में दाना दबा ले चली गौरैया ||

कितनी चंचल और चुलबुली गौरैया !

हम को कितनी लगी है भली गौरैया !!१!!


 कौये’, ‘चील’, ’बाज’ सा इस में कपट नहीं |
'अपने पेट’ के लिये ‘छीन’ या ‘झपट’ नहीं ||

अपनी मेहनत से भरती है पेट सदा-

नहीं है करती कभी धाँधली गौरैया ||

 कितनी चंचल और चुलबुली गौरैया !

हम को कितनी लगी है भली गौरैया !!२!!




 ‘चीं-चीं’-‘चीं-चीं’ चहक चहक कर गाती है

मीठे मीठे सुन्दर गीत सुनाती है ||

‘बक बक’ करती नहीं किसी ‘बड़बोले’ सी-

बातें करती नहीं खोखली गौरैया |

कितनी चंचल और चुलबुली गौरैया !

हम को कितनी लगी है भली गौरैया !!३!!


 शोभा होती यह बसन्त के मौसम की |

बड़ी सलोनी प्यारी होती है सब की ||

फुदक फुदक कर प्यारा नाच दिखाती है-

‘प्रकृति’ की सोनी गोद में पली गौरैया |

कितनी चंचल और चुलबुली गौरैया !

हम को कितनी लगी है भली गौरैया !!४!!


पर्यावरण की भी गौरैया रक्षक है |

और हानिकर कीटों की यह भक्षक है ||

“प्रसून” को यह प्यारी अपनी कविता सी-

लगता इनकी मीत हो चली गौरैया ||

कितनी चंचल और चुलबुली गौरैया !

हम को कितनी लगी है भली गौरैया !!५!!


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6 टिप्‍पणियां:

About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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