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मंगलवार, 22 जनवरी 2013


विवेकोर्मि (स्वामी विवेकानन्द पर आधारित एक अपूर्ण महाकाव्य )


वर्षों पूर्व लिखा गये महाकाव्य की प्रति कुछ दिवस पूर्व दिखाई पड़ 

गयी, सो, इसे इस ब्लॉग पर धारावाहिक रूप में प्रकाशित कर रहा 

हूँ | प्रस्तावित बारह सर्गों में से लिख गये ९ सर्ग आप की सेवा में 

प्रेषित हैं | विवेकानन्द की १५० वीं जयंती के इस शुभ मास में 

उन्हें याद करने वाले द्वितीय सर्ग से प्रारम्भ कर रहा हूँ |

(इस अन्विति के बाद पुन: सर्ग एक से ही पुनरारंभ करूँगा |) =========
   सर्ग-२
==========
(विवेकानन्द-महिमा)
(प्रथम अन्विति) 


वीर विवेकानन्द जगत में ‘ज्योति’ जगाने आये थे |
‘मानवता के मूल्य’ मर चले, उन्हें जिलाने आये थे ||
‘धर्म’ निराश हुआ था, उसको आस दिलाने आये थे |
‘परमार्थ का और प्रेम का स्वरस’पिलाने आये थे ||
===================================
बंजर ‘मन की धरा’ हो चली, ऊसर ‘चिन्तन’ हुये सभी |
सूने सूने ‘आचरणों के वन औ उपवन’ हुये सभी ||
‘कलिकाओं, सुमनों’ के फीके फीके ‘प्रहसन’ हुये सभी |
और ‘प्रेरणा के भ्रमरों’ के शान्त ‘गुन्जन’ हुये सभी ||
‘जन गण का विशवास’ जगाने, ‘आशा-वसन्त’ को ले कर-
त्याग तपो मय ‘सुरभि-कणों’ से जग महकाने आये थे ||
‘मन की धरती’ पर ‘प्रज्ञा-हल’ और चलाने आये थे |
‘आशाओं के मरुद्यान’ में, ‘सुमन’ खिलाने आये थे ||
‘आत्मतत्व के विचार सब को, सहज दिलाने आये थे |
वीर विवेकानन्द जगत में ‘ज्योति’ जगाने आये थे ||१||

‘पाश्चात्य संस्कृति’ का ‘दुर्दम भोगवाद’ था पनप रहा |
‘अपने लिये संकुचित जीवन’ का विवाद था पनप रहा ||
‘खाओ पियो मज़े लूटो’ का ‘घृणित नाद’ था पनप रहा |
जन जन में ‘तन-वर्ण-भेद’ का दुर्विवाद’ था पनप रहा ||
‘ज्ञान-दीप’ को लिये करों में, उर में ले कर ‘प्रेम अमर’-
वे सब को ‘सभ्यता का पावन पन्थ’ दिखाने आये थे ||
‘मानव में परमात्म तत्व’ है, ‘मंत्र’ सिखाने आये थे |
‘कण कण में बस एक सत्व है’, यही बताने आये थे ||

‘और एकता मानवता है’, हमें जताने आये थे |
वीर विवेकानन्द जगत में ‘ज्योति’ जगाने आये थे ||२||

‘वेद-ज्ञान’ के सब ग्रन्थों का ‘अर्थ-अनर्थ’ किया सब ने |
जग में ‘जीवन का हर पल क्षण’, यों ही व्यर्थ किया सब ने ||
अपने चारों ओर ‘लोभ का गहरा गर्त’ किया सब ने |
‘आत्मतेज’ कर क्षीण, ‘काम’ को ‘प्रबल-समर्थ’ किया सब ने ||
वेदान्तों, उपनिषदों, शास्त्रों की ले कर ‘उर्बरक प्रवर’-
छुपे हुये ‘ऊर्जा के अंकुर’ पुन: उगाने आये थे ||
‘हृत्तल’में सोई ‘प्रभु सत्ता’ पुन: जगाने आये थे |
‘लिप्सा की पापिनी निठुर दानवी’ भगाने आये थे ||
और ‘स्नेह रंग’ से’मन-चादर’ पुन: रंगाने आये थे |
वीर विवेकानन्द जगत में ‘ज्योति’ जगाने आये थे ||३|| 
                                           
                              (क्रमश:)
                

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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