आठ दिनों के लम्बे अंतराल के बाद उपस्थित हो कर क्षमा के अतिरिक्त क्या मांग सकते हैं आप सब से ? निकट भविष्य में (१४ फरवरी) होने वाली बेटी की शादी की तैयारियों में उलझे होने के कारण समय से तथा नियमित रूप से उपस्थिति न होने का कष्ट मुझे बहुत है |
इस समय अभी विप्लव शान्त नहीं हुआ है, डाल दी गयी 'राख' के
भीतर भीतरसुलग रही 'आग' के भडकाने का डर बना हुआ है | धीरे
धीरे बुझती इस 'आग'के साथ रचानाओं में भी आनुपातिक शीतलता
दिखाई देती है |
'प्रसून' ब्लॉग पर आज से स्वामी विवेकानन्द पर
आधारित महाकाव्य 'विवेकोर्मि' आप की सेवा में
समर्पित है सुझाव-
(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
जब माँगो तो ‘मजबूरी’ कह, ‘नज़र’ बचाने वाले लोग |
दिखा के ‘जल से भरी सुराही’, ‘प्यास’ जगाने वाले लोग ||
======================================
‘हमदर्दी के ‘स्वाँग’ में माहिर, नाटक रोज़ रचाते हैं |
‘माल मुफ़्त का’ पा जायें तो, उसको तुरत पचाते हैं ||
‘मजमे’, ‘जलसे’, ‘जुलूस’, वाले, ‘तथाकथित’ कुछ ‘नेता’ हैं-
केवल ‘भाषण’ में ‘निर्धनता’ दूर भगाने वाले लोग ||
जब माँगो तो ‘मजबूरी’ कह, ‘नज़र’ बचाने वाले लोग |
दिखा के ‘जल से भरी सुराही’, ‘प्यास’ जगाने वाले लोग ||१||
‘बड़े सुहाने रंग स्नेह के’, ‘मन’ पर चढ़े उतार दिये |
‘आदर्शों की तस्वीरों’ के ‘सारे अक्स’ बिगार दिये ||
‘छल की कूँची’, ‘रंग कपट के’, ‘चित्रकार शैतान’ हैं ये-
‘झूठ की आकृति’ उभार कर के, ‘चित्र बनाने वाले लोग ||
जब माँगो तो ‘मजबूरी’ कह, ‘नज़र’ बचाने वाले लोग |
दिखा के ‘जल से भरी सुराही’, ‘प्यास’ जगाने वाले लोग ||२||
‘प्रेम के कई परिन्दों’ के हैं ‘पर’ काटे ‘लाचार’ किये |
‘अमन’ के सभी ‘कबूतर’ मारे, ‘प्यार के खंजन ‘ मार दिये ||
’राजनीति के धनुष’, ‘स्वार्थ के हाथों’ में थामे देखो-
‘कूटनीति के पैने पैने तीर’ चलाने वाले लोग ||
जब माँगो तो ‘मजबूरी’ कह, ‘नज़र’ बचाने वाले लोग |
दिखा के ‘जल से भरी सुराही’, ‘प्यास’ जगाने वाले लोग ||३||
देश में छुपे लोग हैं लाखों, जिन से हारी ‘मक्कारी’ |
‘ठण्डी द्वेष की बुझी राख’ में, तलाश कर के ‘चिनगारी’ ||
‘बोल’ बोल कर ‘अर्थहीन’ कुछ, ‘व्यर्थ विवाद’ उगलते हैं-
‘शान्ति-वन’ में फूँक के ‘हिंसा’, ‘आग’ लगाने वाले लोग ||
जब माँगो तो ‘मजबूरी’ कह, ‘नज़र’ बचाने वाले लोग |
दिखा के ‘जल से भरी सुराही’, ‘प्यास’ जगाने वाले लोग ||४||
‘अजब सरफिरे’, ‘शान्ति-प्रेम’ से है इनको ‘अलगाव’ हुआ |
‘महक’ से ज़्यादह, ‘चुभन’ से इनको, कितना अजब लगाव’ हुआ ||
‘बड़ी नुकीली सोच’ है इनकी, ‘दर्द’ बाँटने के शौक़ीन-
“प्रसून” के बाग में ‘नागफनी की फ़सल’ उगाने वाले लोग ||
जब माँगो तो ‘मजबूरी’ कह, ‘नज़र’ बचाने वाले लोग |
दिखा के ‘जल से भरी सुराही’, ‘प्यास’ जगाने वाले लोग ||५||
=========================================
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें