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गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

‘हविश की दीमक’(मुकुर काव्य के क्रम से अलग )


 


वैसे आज ही मैं  ' पैसठवे वर्ष'    को पार कर के कल छियासठवें में प्रवेश करूँगा | कल परसों 

के अखवारमें दिल्ल्वी की ह्रदय विदारक घटना ने मेरी खुशियों पर पानी फेर दिया | और मौज-मस्ती 

की रचना की वजाय यही दर्द भरी रचना बन पड़ी,सो मित्र गण मुझे क्षमा कर के इसे स्वीकार करें |

'मुस्कान की वजाय मेरे आँसू कबूल करो |

'दर्द' में गुदागाने की तुम न भूल करो ||

(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)     

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देखो, देखो,’दरिंदगी’ की- हद हो गयी है दिल्ली मे |
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‘सिया हरण’ ‘रावण’ ने कर के ‘संयम’ को मरने न दिया |
उस के ‘अन्दर’ के ‘ज्ञानी’ ने-‘बल-प्रयोग’ करने न दिया ||
किन्तु यहाँ तो, ‘दानवता’ ने शर्मा कर- मुहँ छुपा लिया-
‘मानवता’, ‘पशुता’ के ‘वन’ में, अब खो गयी है दिल्ली में ||
देखो, देखो, ’दरिंदगी’ की हद हो गयी है दिल्ली मे !!१!!

‘मनुज-सभ्यता’ गहरी नींद में है ‘अफीम’ पी सो गयी वहाँ |
तार तार ‘नारी की अस्मत की चादर’ हो गयी वहाँ ||
‘शान निराली’ बनी हुई थी, ’तवारीख की क्यारी’ में |
‘हविश पापिनी’, ‘बीज पाप के’, उफ़ बो गयी है दिल्ली में ||
देखो, देखो, ’दरिंदगी’ की हद हो गयी है दिल्ली मे !!२!!

‘धर्मराज’ की इस नगरी में, ‘अधर्म’ का बजता डंका |
राम-राज्य’ के सपने टूटे, बनी ‘अयोध्या’ है ‘लंका’ ||
‘रंग’ चढ़ा था ‘प्रेम-भाव’ का, ‘कुवासना’ निज हाथों से-
हर ‘रंग’, ‘कीचड़ वाले जल’ से, हा ! धो गयी है दिल्ली में ||
देखो, देखो, ’दरिंदगी’ की हद हो गयी है दिल्ली मे !!३!!

‘भारत का दिल’ घायल हो गया, ‘पापों के नाखूनों’ ने |
‘करवट’ बदली, ’अंगड़ाई’ ली सोये हुये ‘जुनूनों’ ने ||
‘आशाओं’ के “प्रसून” बिखरे; बटोर कर फिर से ‘जनता’-
‘अदम्य साहस-माल’ गूँथ कर सँजो गयी है दिल्ली में ||
देखो, देखो, ’दरिंदगी’ की हद हो गयी है दिल्ली मे !!४!!


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2 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया, साधुवाद !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..!
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (23-12-2012) के चर्चा मंच-1102 (महिला पर प्रभुत्व कायम) पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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