Blogger द्वारा संचालित.

Followers

बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

मुकुर(यथार्थवादी त्रिगुणात्मक मुक्तक काव्य)(३) गुरु-वन्दना (ज्ञान,बिना गुरु, कभी न होता |)

(सारे चित्र 'गूगल-खोज से साभार)

==========================


  
ज्ञान,बिना गुरुकभी न होता |
        
 ++++++ ========++++++

ज्ञान,बिना गुरु कभी न होता,न है ज्ञान-बिन, प्रेम |

बिना प्रेम के कहीं जगत में,नहीं किसी की क्षेम ||१||


बिना प्रेम के शान्ति नहीं है,बिना शान्ति न ध्यान |

बिना ध्यान धारणा अधूरी,आराधन निष्प्राण ||२||



बिन आराधन, मन के दर्पण की न छंटेगी धुन्ध |

बिना स्वच्छ मन, इस जीवन में व्याप्त रहता द्वन्द ||३||



और द्वन्द से,झील चित्त की,मैली है पारान्ध |

जिससे धुँधले हो जाते हैं,प्रभु-प्रेम-अनुबन्ध ||४||

 


==========================

7 टिप्‍पणियां:

  1. होय पेट में रेचना, चना काबुली खाय ।

    उत्तम रचना देख के, चर्चा मंच चुराय ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. 'नज़र,नज़रिया'आप के,बड़े भले हैं मीत!
    इसी लिये तो भा गया, यह 'साधारण गीत' ||
    बन्धु,गीत यह दिल मेरा,आप ने लिया चुराय |
    'इतनी प्यारी चोरियां',काश सभी कर पायं !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. मीत,तुम्हारा स्नेह 'अमर पारस मणि' सा है |
    'वीराने' में किसी 'महकते चन्दन' सा है ||
    अब लगता है ,मीत, 'तुम्हारा भी पवन मन' -
    बिलकुल ही हूबहू,'हमारे ही मन'सा है ||
    शुभ प्रभात !!

    उत्तर देंहटाएं



  4. बिन आराधन, मन के दर्पण की न छंटेगी धुन्ध |

    बिना स्वच्छ मन, इस जीवन में व्याप्त रहता द्वन्द ||३||....द्वंद्व

    अब क्या मिसाल दूं मैं आपकी आशुकविताई की ,........एक रचना इटली की चील पे भी लिखिए जो भारत की संपदा पर दृष्टि ज़माए है ,अब गुजरात इसे लुभाए है ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. खूबसूरती से सजाई गयी रचना !!
    चित्र भी और भाव भी!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुंदर और सार्थक रचना हेतु बधाई स्वीकारें............

    गुरु की जिस पर हो कृपा, खुलते उसके भाग
    पाय सफलता-मान-धन , अरु पाये अनुराग
    अरु पाये अनुराग , सफल जीवन हो जाये
    लक्ष्मी चल कर द्वार, सुखों के सँग में आये
    हुई साधना सफल , सुमिर गुरुनाम शुरू की
    खुलते उसके भाग, हो जिस पर कृपा गुरु की ||


    उत्तर देंहटाएं

About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

मेरे सभी ब्लोग्ज-

प्रसून

साहित्य प्रसून

गज़ल कुञ्ज

ज्वालामुखी

जलजला


  © Blogger template Shush by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP