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सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

देख (एक हकीकत) मेरी पुस्तक -'गवाक्ष' से एक 'व्याजोक्ति'



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अजब 'राम की लीला' देख !   


नाटक 'बड़ा रसीला' देख !!     


'देवताओं के वश' में आया -    


है 'दैत्यों का कबीला' देख !! 


अजब 'राम की लीला' देख !!      


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'राम' के वेश में 'रावन' है |


'आग' छिपाये 'सावन' है ||


धोखे से वह गयी छली |


तडफ रही जैसे मछली ||


तार तार हुआ दामन है |


बुझा हुआ इसका मन है ||


'सिया' के 'बेबस आँसू' से - 


उसका 'आँचल' गीला देख !!


अजब 'राम की लीला' देख !!१!!



यह 'चोरों की कचहरी' है |


गाँव की, है- न शहरी है ||


भीड़ है बड़ी काजियों की |

धन से बिके पाजियों की ||


न्याय की देवी बहरी है || 


बेडी पहन के ठहरी है ||


'कुम्भकर्ण की नींद' में डूबा -


'न्याय-तंत्र' है ढीला देख !!



अजब 'राम की लीला' देख !!२!!



रसोई है कंगालों की |  ||


भूखे प्यासे लालों की ||


पीड़ा इनकी कौन सुने-


सुन कर सिर क्यों, कौन धुनें ??


'बुझते हुए  उजालों' की |


'टूटी हिम्मत वालों' की- 


दाल न पकी बुझ गया चूल्हा-


फूटा हुआ पतीला देख !!


अजब 'राम की लीला' देख !!३!!


'वर्त्तमान' की बातें  कर !


'प्यार भरी दिन रातें', कर !!


'बीती बात' विसार के चल !


मत लड़ने  के लिये मचल !!


'साबुत', 'टूटे नाते' कर !


मत 'घातें- प्रतिघातें' कर !!


गड़े हुए शब यहाँ कई-


बस कर खोद न टीला देख !!


अजब 'राम की लीला' देख !!४!!



छलिया 'कपटी बाबा' है |


खाता 'मक्खन -मावा' है ||


पहले रसीद कटवा ले- 



फिर चाहे जितना खा ले ||


'भण्डारा' क्या 'ढाबा' है |


अच्छा भला छलावा है ||


दुराचार छिप गये आड़ में -


चोला काला पीला देख !!


अजब 'राम की लीला' देख !!५!!




बिकनी में यों नारी है |



'बाड़ बिना ज्यों क्यारी' है ||


हलवा या कि मलीदा है |


देकर नोट खरीदा है ||


'रूप' का यह 'व्यापारी' है |


'खुल कर', 'लाज उतारी' है ||


'मुन्नी' को बदनाम कर दिया -


'शील' बेचती 'शीला' देख !!



अजब 'राम की लीला' देख !!६!!


 



प्यार से या मक्कारी से |


या फिर मारामारी से ||



'अपराधों का फरिश्ता' है |  


'जेल' से उसका 'रिश्ता' है ||


काम नहीं कुछ 'यारी' से |


ऐंठा है दमदारी से ||


"प्रसून"कल का गुण्डा बन गया -



नेता छैल छबीला देख !!


अजब 'राम की लीला' देख !!७!!



            

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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