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सोमवार, 21 जनवरी 2013

!इन्हें पहँचानिये!(१) ‘प्यास’ जगाने वाले लोग | –


आठ दिनों के लम्बे अंतराल के बाद उपस्थित हो कर क्षमा के अतिरिक्त क्या मांग सकते हैं आप सब से ? निकट भविष्य में (१४ फरवरी) होने वाली  बेटी की शादी की तैयारियों  में उलझे होने के कारण समय से  तथा नियमित रूप  से उपस्थिति न होने का कष्ट मुझे बहुत है |

इस समय अभी विप्लव शान्त नहीं हुआ है, डाल दी गयी 'राख' के 


भीतर भीतरसुलग रही 'आग' के भडकाने का डर बना हुआ है | धीरे 

धीरे बुझती इस 'आग'के साथ रचानाओं में भी आनुपातिक शीतलता

दिखाई देती है | 

'प्रसून' ब्लॉग पर आज से स्वामी विवेकानन्द पर 

आधारित महाकाव्य 'विवेकोर्मि' आप की सेवा में 

समर्पित है सुझाव-

(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)   
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
जब माँगो तो ‘मजबूरी’ कह,  ‘नज़र’ बचाने वाले लोग |
दिखा के ‘जल से भरी सुराही’, ‘प्यास’ जगाने वाले लोग ||

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‘हमदर्दी के ‘स्वाँग’ में माहिर, नाटक रोज़ रचाते हैं |
‘माल मुफ़्त का’ पा जायें तो, उसको तुरत पचाते हैं ||
‘मजमे’, ‘जलसे’, ‘जुलूस’, वाले, ‘तथाकथित’ कुछ ‘नेता’ हैं-
केवल ‘भाषण’ में ‘निर्धनता’ दूर भगाने वाले लोग ||
जब माँगो तो ‘मजबूरी’ कह,  ‘नज़र’ बचाने वाले लोग |
दिखा के ‘जल से भरी सुराही’, ‘प्यास’ जगाने वाले लोग ||१||

 

‘बड़े सुहाने रंग स्नेह के’, ‘मन’ पर चढ़े उतार दिये |
‘आदर्शों की तस्वीरों’ के ‘सारे अक्स’ बिगार दिये ||
‘छल की कूँची’, ‘रंग कपट के’, ‘चित्रकार शैतान’ हैं ये-
‘झूठ की आकृति’ उभार कर के, ‘चित्र बनाने वाले लोग ||
जब माँगो तो ‘मजबूरी’ कह,  ‘नज़र’ बचाने वाले लोग |
दिखा के ‘जल से भरी सुराही’, ‘प्यास’ जगाने वाले लोग ||२||


‘प्रेम के कई परिन्दों’ के हैं ‘पर’ काटे ‘लाचार’ किये |
‘अमन’ के सभी ‘कबूतर’ मारे, ‘प्यार के खंजन ‘ मार दिये ||
’राजनीति के धनुष’, ‘स्वार्थ के हाथों’ में थामे देखो-
‘कूटनीति के पैने पैने तीर’ चलाने वाले लोग ||
जब माँगो तो ‘मजबूरी’ कह,  ‘नज़र’ बचाने वाले लोग |
दिखा के ‘जल से भरी सुराही’, ‘प्यास’ जगाने वाले लोग ||३||


देश में छुपे लोग हैं लाखों, जिन से हारी ‘मक्कारी’ |
‘ठण्डी द्वेष की बुझी राख’ में, तलाश कर के ‘चिनगारी’ ||
‘बोल’ बोल कर ‘अर्थहीन’ कुछ, ‘व्यर्थ विवाद’ उगलते हैं-
‘शान्ति-वन’ में फूँक के ‘हिंसा’, ‘आग’ लगाने वाले लोग ||
जब माँगो तो ‘मजबूरी’ कह,  ‘नज़र’ बचाने वाले लोग |
दिखा के ‘जल से भरी सुराही’, ‘प्यास’ जगाने वाले लोग ||४||


‘अजब सरफिरे’, ‘शान्ति-प्रेम’ से है इनको ‘अलगाव’ हुआ |
‘महक’ से ज़्यादह, ‘चुभन’ से इनको, कितना अजब लगाव’ हुआ ||
‘बड़ी नुकीली सोच’ है इनकी, ‘दर्द’ बाँटने के शौक़ीन-
“प्रसून” के बाग में ‘नागफनी की फ़सल’ उगाने वाले लोग ||
जब माँगो तो ‘मजबूरी’ कह,  ‘नज़र’ बचाने वाले लोग |
दिखा के ‘जल से भरी सुराही’, ‘प्यास’ जगाने वाले लोग ||५||
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मंगलवार, 1 जनवरी 2013

सामयिकी (६)(नव वर्ष) (२)इस नए वर्ष को |



कल नेट रिचार्ज की सुविधा समय से उपलब्ध न होने  तथा फिर    अचानक वोडाफोन का सर्वर फेल होने के कारण इंटरनेट से देर में जुडने के कारण रचना आज पोस्ट कर रहा हूँ | सब को नव वर्ष की हार्दिक वधाई के साथ मनो वेदना का मीठा स्वाद-
(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)  
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हर कोई ‘इस नये वर्ष’ को, कुछ इस तरह मनाये |
‘उम्मीदों के भवन’ जो टूटें, फिर से उन्हें बनाये ||

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‘देश की जनता’ जुड कर, ‘मानवता की शक्ति’ बटोरे |
बिखरे ‘मन के मोती’ टूटे, फिर ‘माला’ में जोड़े ||
कुछ करने का करे इरादा, ‘परिवर्तन’ लाने का-
पकड के माइक, चीख चीख कर, दे मत ‘भाषण कोरे’ ||
करे ‘कामकी बात सार्थक’, ‘ओज’ भरे ‘वाणी’ में-
सोई ‘ताक़त’ जगे, उन्हें बस, ‘वह सन्देश’ सुनाये ||
हर कोई ‘इस नये वर्ष’ को, कुछ इस तरह मनाये |
‘उम्मीदों के भवन’ जो टूटें, फिर से उन्हें बनाये ||१||

 

‘विगत वर्ष’ की ‘कोई गलती’ अब न कोई दोहराये |
आपस की नफ़रत की खाई’ अब न कहीं गहराये ||
और एकजुट हो कर, ‘संगठना की शक्ति’ बढ़ाकर-
‘मानवता’ साहस कर, ‘सारी दानवता’ को हराये ||
मिला के ‘सुर’ में ‘सुर’, ‘सरगम’ हम, कर ‘आवाज़’ को ‘जिन्दा’-
‘प्यार’ कहीं सोया हो, उसको, बजा के ‘बिगुल‘ जगाये ||
हर कोई ‘इस नये वर्ष’ को, कुछ इस तरह मनाये |
‘उम्मीदों के भवन’ जो टूटें, फिर से उन्हें बनाये ||२||



कवियों में कुछ ‘कालिदास’, कुछ ‘शेक्सपियर’ से उपजें |
और ‘चन्द्रवरदायी’, भूषण, ‘ओज’ है क्या, यह समझें ||
कई ‘जायसी’, ‘तुलसी’, ’मीरा’, हों ‘रसखान’, ‘सूर’ से-
‘गुप्त’, ‘प्रसाद’ से सुलझे हों ये, मत ‘विवाद’ में उलझें ||
‘भारतेंदु’ से, ‘शुक्ल’, ‘दास’ से, ‘प्रेमचंद’ जैसे कुछ-
‘काव्य-कला’, साहित्य से अपने देश को तनिक उठायें ||
हर कोई ‘इस नये वर्ष’ को, कुछ इस तरह मनाये |
‘उम्मीदों के भवन’ जो टूटें, फिर से उन्हें बनाये ||३||

 




‘नाट्य-कला के सिद्ध’ देश के कुछ ‘अभिनेता’ अच्छे |
‘सुधारवादी’ भरें ‘हृदय’ में, ‘भाव प्रेम के सच्चे’ ||
‘नग्नवाद’ के थाल’ परोसें, रचें न ‘ऐसी फ़िल्में’-
‘कुवासना’ में रत हो कर के, जिनसे बिगाडें बच्चे ||
मत नाचें अब ‘नाच दिगम्बर’, ‘पंख उठे मोरों’ से-
‘मुन्नी’,’शीला’ को आधे से कम’ न वासन पहनायें ||
हर कोई ‘इस नये वर्ष’ को, कुछ इस तरह मनाये |
‘उम्मीदों के भवन’ जो टूटें, फिर से उन्हें बनाये ||४||


“प्रसून” सारे देश में अपने, बने, ‘सन्तुलन’ ‘गति’ का |
तब होवे ‘सपना’ सच ‘अपने हिन्द की सही प्रगति’ का ||
‘न्याय’ और ‘व्यापार’, ‘प्रशासन, सब मिल देश सुधारें-
‘सद्उपयोग’ सदा हो भारत में सब की ‘सन्मति’ का ||
‘व्यभिचारों’ पर ‘अंकुश’ लग कर, दशा देश की सुधरे-
‘भ्रष्टाचार’ की आग बुझे, हम ढंग कोई अपनाएं ||
हर कोई ‘इस नये वर्ष’ को, कुछ इस तरह मनाये |
‘उम्मीदों के भवन’ जो टूटें, फिर से उन्हें बनाये ||५||



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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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