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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

मैं बंजारा भारत का |वर्तमान कड़ियाँ (सन् २००७ के बाद की यात्रायें) (२) सब कुछ खो कर घर को लौटे !

         दिनाँक व दिन किसी दोष के कारण एक दिन पूर्व का आ रहा है !

(बुधवार  २३-१०-२०१३)

'गूगल-खोज' से लिया गया यह चित्र केवल सांकेतिक है | इस का घटना-

क्रम से कोई सम्बन्ध नहीं है !

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(ख)अमानत में खयानत
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मैं क्या करता ? खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे ! मैं किस पर अपनी पीड़ा का बोझ डालता ? मेरा कौन था वहाँ ?? मेरा ‘विशवास’ चला गया था | मेरे ‘आत्म विशवास  घायल हुआ था | मेरी ‘सतर्कता’ पर चोट लगी थी | सामने बैठा वह नौजवान ही मेरालक्ष्य हो सकता था मेरी इस दशा का कारण | मेरी बौखलाहट उसी पर बरस पड़ी-“ मेरा साम,अन् तुम्हारे कारण  गया है | एकाएक इस अप्रत्याशित ‘वाणी-आक्रमण’ से बौखला गया वह भी | ‘रेलगाड़ी’ दौड़ रही थी मेरा सामान लुटवा कर या मुहँ छुपाने को भाग रही थी | मैं उस नौजवान को डांट  रहा था | अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकी तब तक उस युवक पर मेरी आरोप भरी फटकार का असवर पड़ चुका था | इससे पहले कि उस की बूढ़ी माँ कुछ समझ पाती ,वह उतरा और एक दूसरे नौजवान, जो कि उस से कुछ बड़ा था, को कस कर पकड़ कर ले आया | वह काफ़ी  बदहवास था | नशे का उस पर असर था | जो नौजवान मेरे सामान के लिये उत्तरदाई था और इस स्मैकिए को पकड़ कर लाया था उस का नाम था बबलू और वह था हाथरस सिटी का निवासी | आते ही एक विजेता की भाँति बोला-“अंकल जी! सामान इस के साथी ने चुराया है |“
       उस की इस बातको सुन कर डिब्बे में सभी नौजवान चौंक कर सक्रिय हो गये थे | वह रोने का स्वाँग करता हुआ लगातार कहता रहा-“मैंने किसी को सामान उतार कर नहीं दिया |” कई लोगों ने और मैंने भी जब उस से पूछा कि वह कैसे कह सकता है कि उस की साजिश से सामान गया है तो बबलू ने बताया-“यह अभी स्टेशन पर कई डिब्बों में घुसा और उतरा किसी से गुप-चुप तरीके से बातें कर रहा था | फोन पर भी इस ने किसी से शक पैदा करते हुये बात की |” इस पर सभी को उस पर सन्देह हो गया और सब ने उसे बहुत मारा पर कोई खतरनाक चोट नहीं आने दी | मैंने लोगों को बड़ी कठिनाई से रोका नहीं तो कोई अनहोनी हो सकती थी | कई बार छोटे स्टेशनों पर उस ने उतरने का प्रयत्न किया पर बहुत से भर्ती से लौटे जवान उसे रोके रहे | एक छोटे स्टेशन पर वह उतरा किन्तु बबलू उस के पीछे उतरा तथा उसे कास कर पकड़ कर ले आया और उस ने बताया-“ जायेगा कहाँ इस का मोबाइल मेरे पास है |”
         मेरा हाल, ‘एक प्याला प्राप्त किसी प्यासे’ जैसा था | मुझे लगा कि शायद मेरा सामान मिल जायेगा | मेरी जान में जान आ गई थी | लोगों ने यह तय किया कि आगे हाथरस सिटी आएगा वहाँ इसे गी.आर.पी. को सौंप दिया जाये | इस पर मैं ने जब यह पूछा कि मेरे साथ कौन जायेगातो बबलू ने कहा-“ अंकल जी आप चिन्ता न करें | मैं आप के साथ हूँ न !” उसके इन ‘सान्त्वना-वचनों’ पर उस की माँ पानी फेरती रही यह कह कर-“नहीं तू कही नहीं जायेगा | इनका सामान है ये खुद निपटें | तू क्यों टांग अडाता है ?” बबलू के लाख समझाने पर भी वह वृद्धा मेरे साथ जाने को तैयार नहीं हुई तो नहीं हुई | खैर, हाथरस सिटी आने पर बबलू  एक खुले गेहुएं रँग के और एक श्यामले नौजवान सहित दो तीन और नौजवानों को अपना दायित्य सौंप कर उतरने लगा | यहाँ ट्रेन कुछ अधिक देर न सही पर छोटे स्टेशनों से तो अधिक रुकनी थी | साथ के उन तीन चार नौजवानों ने मुझे मथुरा में चोर के उस नशेड़ी साथी को सौंपने का इरादा पक्का कर लिया था | उस नशेड़ी ने अपना नाम दिनेश बताया था | मैं क्या करता ? असहाय था | हर एक की राय मेरे लिये कीमती थी |  
            मेरे मस्तिष्क में एक बात तो कौंधी | मैंने बबलू को तुरत बुला कर मोबाइल माँग लिया जिसे उस ने बिना किसी हीला हवाला के मुझे दे दिया | ट्रेन काफ़ी देर रुकी पर पुलिस अभी तक नहीं आयी | हाँ ! इस बीच दिनेश सहित दोतीन नौजवान बबलू के मोबाइल से उस के बताए नंबरों पर उस की पत्नी और बहिन से बात करने तथा उस के नाम पता की जाँच पडताल करने का प्रयास करते रहे | उस की हर झूठ पर उस की पिटाई होंती | वह एक के बाद एक नए बहाने कर के सन्देह को और भी पुष्ट करता रहा और पिटता रहा | वह मोबाइल दो तीन हाथों में अदल बदल कर रहा बीच में मेरे हाथ में भी आया | पर अन्त में उस थोड़े गोरे नौजवान ने अपने हाथ में ले लिया | इसी बीच एक जी..आर.पी. का जवान दिखाई दिया जो हल्ला गुल्ला सुन कर भेजा गया प्रतीत होता था | लोगों की पुकार पर उस ने उस नशेड़ी को उतारा और मुझे साथ चलने को कहा | हडबडी में मोबाइल मैं न ले सका | मैं अपना ब्रीफकेस ले कर उतरा और उस हिमायती गेहुएं जवान से साथ चलने को कहता ही रह गया | न तो पुलिस वाला ही रुका और न ही ट्रेन | ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ ली और में था जी.आर.पी..थाने में उस नशेड़ी के साथ  | सिकंदाराराव में जी.आर.पी. के केंद्र के न होनी की बात मुझे पहले ही बता दी गयी थी | 
      
  मेरे मस्तिष्क में एक बात तो कौंधी | मैंने बबलू को तुरत बुला कर मोबाइल माँग लिया जिसे उस ने बिना किसी हीला हवाला के मुझे दे दिया | ट्रेन काफ़ी देर रुकी पर पुलिस अभी तक नहीं आयी | हाँ ! इस बीच दिनेश सहित दोतीन नौजवान बबलू के मोबाइल से उस के बताए नंबरों पर उस की पत्नी और बहिन से बात करने तथा उस के नाम पता की जाँच पडताल करने का प्रयास करते रहे | उस की हर झूठ पर उस की पिटाई होंती | वह एक के बाद एक नए बहाने कर के सन्देह को और भी पुष्ट करता रहा और पिटता रहा | वह मोबाइल दो तीन हाथों में अदल बदल कर रहा बीच में मेरे हाथ में भी आया | पर अन्त में उस थोड़े गोरे नौजवान ने अपने हाथ में ले लिया | इसी बीच एक जी..आर.पी. का जवान दिखाई दिया जो हल्ला गुल्ला सुन कर भेजा गया प्रतीत होता था | लोगों की पुकार पर उस ने उस नशेड़ी को उतारा और मुझे साथ चलने को कहा | हडबडी में मोबाइल मैं न ले सका | मैं अपना ब्रीफकेस ले कर उतरा और उस हिमायती गेहुएं जवान से साथ चलने को कहता ही रह गया | न तो पुलिस वाला ही रुका और न ही ट्रेन | ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ ली और में था जी.आर.पी..थाने में उस नशेड़ी के साथ  | सिकंदाराराव में जी.आर.पी. के केंद्र के न होनी की बात मुझे पहले ही बता दी गयी थी | 
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(क्रमश:)      

                                          


शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

मैं बंजारा भारत का |वर्तमान कड़ियाँ (सन् २००७ के बाद की यात्रायें)

आज पन्द्रहवें दिन घरेलू झंझावातों,इधर उधर की दौड़ और नेटवर्क

 की समस्याओं से झूझ कर पुन:आपके सामने अपनी एक यात्रा के

 दौरान केक अनहोनी असावधानी के चुभते काँटों के साथ |  
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===========================================    (२) सब कुछ खो कर घर को लौटे !
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नीचे के चित्र का सम्बन्ध मेरी आपबीती से कुछ भी नहीं अपितु गूगल-खोज से लिया यह एक सांकेतिक चित्र है ! 

अक्टूबर, वर्ष २०१३ की यह यात्रा किसी प्रकार भी शुभ या उत्साह वर्द्धक नहीं कही जा सकती है | १४ अक्टूबर की इस यात्रा में बहुत कुछ सीखने को मिला | मेरे ‘अति विशवास’ और ‘अनुभव’ को क़रारी चोट लगी | यानी यह मेरी ‘दिल तोड़ यात्रा’ थी | मेरी यह चावालिसवीं ‘भारत-दर्शन’ की यात्रा थी जिसमें मैने पहली वार ‘धर्म-स्थल’ को मुख्य लक्ष्य बनाया था |
       इस यात्रा का अग्रिम आरक्षण  मेरे पुत्र राहुल गौरव दत्त ने २० सितम्बर को ही घर में उपलब्ध इन्टरनेट सुविधा पर ऑनलाइन कर दिया था –मथुरा से उज्जैन १४ अक्टूबर २०१३ को तथा वापसी का २५ अक्टूबर २०१३ को उज्जैन से मथुरा | इस यात्रा में १६ अक्टूबर से २५ अक्टूबर तक उज्जैन, इंदौर क्षेत्र, भोपाल क्षेत्र, के दस-बारह स्थलों का भ्रमण करना था एवं २६ अक्टूबर से २८ या २९ अक्टूबर तक कन्नौज, मथुरा व धौल पुर आदि स्थानों का भ्रमण-दर्शन, लेखन करना था | अति उत्साह में था और सब कुछ ठीक ठाक था |
         अच्छा भला चला था अपने गृह-नगर पीलीभीत से कासगंज और वहाँ से आधा घंटा लेट गाड़ी सं.५५३४१ से मथुरा जा रहा था | अथाह भीड़ वाली इस रेलगाड़ी में भीड़ अकूत थी, भर्ती वाले नौजवानों की अनियंत्रित भीड़ | अफीमचियों, स्मैकियों चरसियों और शराबियों से सशंकित भीड़ | जेब कतरों, उठाईगीरों से शंकित ठसाठस भरी गाड़ी | इसम पैसेंजर गाड़ी में आखीर से इंजन के पहले दो डिब्बों तक पान रखने को जगह नहीं | केवल धक्कामुक्की में माहिर नौजवान बैठ सकते थे | मिया जैसे तैसे इंजन से पहले दूसरे डिब्बे में बैठ सका | बैठ क्या सका,खड़ा ही रहा सिकंदाराराव तक | दरवाज़े के पास वाली सीट के ऊपर मचान पर सामान रखा | ट्राली-बैग ब्रीफकेस के ऊपर मध्यमाकार कन्धे का थैला | बड़ी देर तक सिकंदाराराव तक तो सीट न मिलने के कारण सामान के पास बैठा रहा | सिकंदाराराव आने पर यात्री उतरे तो स्थान सामने की एक सीट मिली ‘अन्धे को दो आँखों’ की तरह | भीड़ के कारण इतना अवसर न मिला कि सामान सीट तक न ला सका या यों कहो कि ‘होतव्यता’ ने मति भ्रष्ट कर दी अन्यथा कन्धा-बैग तो ले कर बैठ ही सकते थे |
       ओह ! सामने के सज्जन नुमा नौजवान ने बार हठ कर के सामान लाने को सिर्फ इस लिये मना कर दिया कि सीट घिर जायेगी | उसने गारंटी दी कि सामान वह देखता रहेगा | सिकन्दराराव से गाड़ी चलते ही, उस नौजवान के मुहँ घूमते ही मैंने सामान पर एक ‘लुटरा हाथ’ आते देखा | लों, जब तक मैं चिल्ला कर आगे बढ़ता, गाड़ी चल पड़ी और बैग लेकर वह बेदर्द उठाईगीर यह गया –वह गया ! मेरे लिये आजीवन पीड़ा दे गया | घरवालों के बार बार मना करने पर मेरी
मारी गयी मति ने उसी बैग में मेरा वर्ष १९६३ का हाईस्कूल का प्रमाणपत्र रख दिया था और जीवन भर प्राप्त साहित्यिक सम्मान-प्रमाणपत्र और बड़े छोटे कवि-सम्मेलनों में सहभागिता के प्रमाणपत्रों की फ़ाइल भी रख दी थी, जिन के फोटोस्टेट भी मेरे पास नहीं हैं, वे भी उसी बैग में थे | इन में से कुछ तो बहुत ही महत्वपूर्ण थे | जैसे वर्ष १९८५ में खटीमा के अपने मित्र डॉ.रूप चन्द्र शास्त्री ”मयंक” के साथ शेक्सपियर हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के तत्वाधान में प्राप्त प्रमाणपत्र | उस समय डॉ.शास्त्री मरी कर्म क्षेत्र बनवसा में ही थे | दूसरा प्रमाण पत्र था वर्ष २००० में जैमिनी अकादमी पानीपत से प्राप्त ‘आचार्य’ की मानद  उपाधि | तीसरा प्रमाण पत्र था नजीबाबाद की एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था द्वारा  कैम्पा कोला फैक्ट्री में सम्पन्न कार्यक्रम में प्राप्त शोध-पत्र वाचन का और मुरादाबाद में डॉ.महेश दिवाकर द्वारा सम्पन्न सम्मलेन का, दिल्ली आदि स्थानों में प्राप्त प्रमाणपत्र थे | नेपाल महाकाली अंचल के कंचनपुर जिल्ला के मुख्यालय महेन्द्रनगर में वहाँ के राष्ट्रीय स्तर के एक साहित्य-सम्मलेन में सहभागिता एवं कविता-वाचन का महत्वपूर्ण प्रमाणपत्र विशेष था | इस कार्यक्रम में खटीमा के मित्र कवि राजकिशोर “राज” एवं डॉ चन्द्र शेखर जोशी भी साथ थे | संस्कार भारती, साहित्य शारदा मंच आदि से प्राप्त प्रमाण पत्रों सहित कई प्रमाणपत्र थे जो अब मेरे लिये निर्थक प्राय हो चुके हैं | वैसे इन सभी प्रमाणपत्रों के सूत्र तलाशने का प्रयास करने का प्रयास करूँगा |
संस्कार भारती, साहित्य शारदा मंच आदि से प्राप्त प्रमाण पत्रों सहित कई प्रमाणपत्र थे जो अब मेरे लिये निर्थक प्राय हो चुके हैं |
     अन्त;वस्त्रों, सेल चार्जर, मोवाइल चार्जर ताला चाबी की तो बात ही छोडो ! पुन; मिल जायेंगे पर प्रमाण पत्र जो गये तो गये | हाथ ही मलना है |                     
 (क्रमश:)

          
               

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

झरें नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य ) (एक नई रचना)


 
गान्धी जैसा कौन अब ?  
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कुक्कुरमुर्त्तों’ से उगे, ‘नेता’ आज अनेक |

गान्धी जैसा कौन अब, चले ‘लकुटिया’ टेक ??

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‘नेतागीरी’ आजकल, बना हुआ ‘व्यवसाय’ |

बने ‘झोपड़ी’ से ‘महल’, पा कर ‘मोटी आय‘||

कई गुना हैं कमाते, जितना खर्चें ‘दाम’ |

निस्स्वार्थ अब खर्च क्यों, कोई करे ‘छदाम’ ||

‘जुवा चुनावी’ जीत ले, ‘छल के पाँसे’ फेंक |

गान्धी जैसा कौन अब, चले ‘लकुटिया’ टेक ??१??


देखो ‘बगुले’ बन गये, ‘राजनीति के हंस’ |

ये सब कसते ‘प्रेम के, तालों’ में ‘विध्वंस’ ||

अपनी अपनी ‘ढपलियों’, पर अपने ही ‘राग’ |

जगह-जगह हैं फूँकते, ‘लीडर’ ‘कलह की आग’ ||

जला के ‘चूल्हा फूट का’, ‘रोटी’ रहे हैं सेंक |

गान्धी जैसा कौन अब, चले ‘लकुटिया’ टेक ??२??


अगर आपदा हो कहीं, अपना करें बचाव |

पा के तट ये स्वयं तो, डुबा के सब की ‘नाव’ ||

‘कुटिल कटारी’ हाथ ले, जिस की पैनी ‘धार’ |

‘मीठे’ बन कर काटते, हैं ‘आपस का प्यार’ ||

हमें बताओ कौन है, धीर-वीर औ नेक ?

 गान्धी जैसा कौन अब, चले ‘लकुटिया’ टेक ??३??



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मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

गान्धी-यश-गन्ध(१) पुकार के क्रन्दन-स्वर (क) ! आओ बापू तुम आओ !

आज बहुत लम्बी विषम परिस्थितयों के बाद  नेटवर्क की समस्या से कुछ छुटकारा मिलाने पर पुन: एक पुरानी रचना हाकलि छन्द में साथ ले कर उपस्थित हूँ | 
(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)  

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आओ बापू तुम आओ !
फिर से भारत में छाओ !!
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भारत तुम्हें पुकार रहा |
आर्त्त तुम्हें जुहार रहा ||
पड़ीं दरारें ‘धर्मों’में |
और लगा घुन ‘कर्मों’ में ||
चारों और दिखावा है |
कृत्रिम एक छलावा है ||
और ‘एकता’ नकली है |
आज यहाँ क्या असली है ||
तुम ‘संगठना’सिखलाओ !
‘प्रेमामृत’तुम सरसाओ !!
तुम ‘मौलिकता’ पनपाओ !!
जन जन को तुम अपनाओ !!
आओ बापू तुम आओ !!१!!


ऐसे भी कुछ नेता हैं |
जो पूरे अभिनेता हैं ||
खादी का परिधानाम्बर |
आज बना है आडम्बर ||
पहले जो थे ‘वतन-परस्त’ |
आज हुये हैं ‘स्वतन-परस्त’ ||
टूट चुकी ‘मर्यादा’ है |
बूढा हुआ ‘इरादा’ है ||
‘नयी जवानी’ तुम लाओ !
ढंग कोई भी अपनाओ !!
सब को ‘राहें’ दिखलाओ !
अब न् और तुम बिलखाओ !!
आओ बापू तुम आओ !!२!!


‘आजादी’ आवारा है |
सबके हाथ ‘दुधारा’ है ||
सब अपनी ही सोचरहे |
औरों को सब नोच रहे ||
‘तोड़ चला दम’ ‘साहस’ है |
‘जगा हुआ’ ‘दुस्साहस’ है ||
चारों और ‘अँधेरा’ है |
‘प्रकाश’ ने ‘मुहँ फेरा’ है ||
फिर से ‘दीपक जलवाओ’ !
‘अँधियारी’ को हटवाओ !!
‘तम की कारा कटवाओ’ !
‘धुन्ध कलूटी’ ‘छँटवाओ’ !!
आओ बापू तुम आओ !!३!!
‘लाज-शर्म’ है ‘दिक्-अम्बर’ |
‘नग्न वाद’का आडम्बर |
‘आवश्यकता’ गौण हुयी |
‘उपादेयता’ ‘मौन हुयी’ ||
मुख्य हुआ है और ‘व्यसन’ |
बढ़ा हुआ है यों ‘फैशन’ ||
अब कलुषित ‘उजियारे’ हैं |
नकली ‘चाँद-सितारे’ हैं ||
‘नया सूर्य’ तुम चमकाओ ! 
‘मन-सु-गगन’ तुम दमकाओ !!
‘वीराने’ को ‘महकाओ’ !
‘आशा-कोकिल’ ‘चहकाओ’ !
आओ बापू तुम आओ !!४!!
‘आवश्यकता’ ‘मुहँ बाये’ |
सुरसा सा मुहँ फैलाये ||
‘पवन पुत्र उत्पादन का’ |
बढ़ा रहा ‘वजूद तन का’ ||
बढ़ी कतारें राशन की |
‘उम्र बढ़ी’ है ‘भाषण’ की ||
तुम्हीं ‘समस्या सुलझाओ’ !
और अधिक मत उलझाओ !!
हमें तसल्ली दे जाओ !
‘सुख के बादल बरसाओ’ !!
आओ बापू तुम आओ !!५!!
‘घायल है गणतन्त्र’ यहाँ |
‘पनपा धन का तन्त्र’ यहाँ ||
‘वित्त वाद की धूम’ यहाँ |
‘दबे हुये मासूम’ यहाँ || 
‘कानूनों पर जंग लगी’ |
‘मनमानी हर अंग लगी’ ||
‘शोषण’ की है ‘आस जगी’ |
‘शोणित की है प्यास जगी’ ||
‘प्रीति-सुमन’ बन ‘खिल जाओ !
‘गन्ध शान्ति की भर जाओ’ !!
‘सत्य का चन्दन’ बन जाओ !  
हमें ‘सुवासित कर जाओ !!
आओ बापू तुम आओ !!६!!
‘शिक्षा-दीक्षा’ ‘बिकती है’ |
‘चतुर समीक्षा’ बिकती है ||
मन्दिर में ‘भगवान’ ‘बिका’ |
‘गली गली’ ‘इंसान’ बिका ||
‘बिकते’ ‘भजन कीर्तन’ हैं |
‘बिका हुआ’ ‘जन-गण’-‘मन’ है ||
‘बिकते’ देखो ‘वोट’ यहाँ !
मुख्य हुये अब ‘नोट’ यहाँ ||
‘लोभ की चादर’ ‘सिमटाओ !
‘श्रद्धा-सेवा’ ‘पनपाओ !!
‘उजडा है’ ‘मधुवन’ आओ !
दुखित हुआ है ‘मन’ आओ !!

आओ बापू तुम आओ !!७!!

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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