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शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (11) स्वर्ण-कीट (घ) तिज़ोरी-दिल |

(सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)

भटक रहा बेघर हुआ, अरे सलोना प्यार’ |
हृदय तिज़ोरीहो गये, औ चाहव्यापार ||
घेर चुके हैं प्रीतिको , लोभी ‘अन्तर्द्वन्द’ |
जैसे मैनास्वर्ण के, पिंजरेमें हो बन्द ||
व्यवसायों’ के ‘जालमें फँसे नेह-सम्बन्ध’ |
रिश्तों’ की ‘गर्दनफँसी, पड़े स्वार्थ’ के ‘फन्द’ ||
चमक-दमकसे छिप गये, ‘नैसर्गिक व्यवहार’ |
हृदय तिज़ोरीहो गये, औ चाहत व्यापार’ ||||


वित्त्वाद के ‘पत्थरों’, की यों निष्ठुर ‘चोट’ |
कोमल ‘कोंपल प्रेम की’, पाने लगी ‘कचोट’ ||
क्यों पैसों की पोटली’, मन’ पर दी है लाद |
बोझतले दबने लगी, है प्रियतम’ की ‘याद’ ||
उफ़ ! ‘यन्त्रों के शोर’ में, दबी  भ्रमर-गुंजार’ |
हृदय तिज़ोरीहो गये, औ चाहत व्यापार’ ||||
चिन्तनको जकड़े हुये, ‘सोने’ की ‘जंजीर’ |
तथा पराये दर्द में, बहे न दृग’ से नीर ||
जज्वेठण्डे’ हो गये, ‘अपनेपनके आज |
मानो सिल्ली बर्फ़ की’, प्यार भरे ‘अन्दाज़’ ||
चलो  दिलोंमें  हम  करें, गरम जोश ‘बौछार!
हृदय तिज़ोरीहो गये, औ चाहत ‘व्यापार’ ||||





2 टिप्‍पणियां:

About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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