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गुरुवार, 9 जनवरी 2014

नयी करवट(दोहा-गीतों पर एक काव्य) (१)(सब का प्यार)(क)एक जल


(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 

मित्रों!  आज 'नयी करवट' जो कि मेरा एक नव रचित दोहा-गज़ल-काव्य है, के प्रकाशन का शुभारम्भ कर रहा हूँ |यह एक  प्रथम अध्याय 'रहस्यवादी  दर्शन' का अध्याय है  | इस में कुल छ: या सात रचनाएँ हैं जिन में विशेषार्थ, कुछ प्रतीकों, रूपकों या उपमाओं को एकल उद्धरणों में प्रदर्शित किया गया है ! आप का इस गंभीर -शान्त रस-प्रधान अध्याय में  स्वागत हैं ! 

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नदियाँ सारी अलग हैं, अलग अलग है राह |
पर सब में है ‘एक जल’, जिसका रहे ‘प्रवाह’ ||
‘दिशा’ सभी की अलग है, ‘गति’ है सब की भिन्न |
पर ‘सागर’ तो ‘एक’ ही, देता उन्हें पनाह ||
एक ‘नीर’ के ‘स्रोत’ हैं, ‘नाले’, ‘पोखर’ ‘ताल’ |
कुछ ‘उथले’, हैं ‘गहन’ कुछ, पर है ‘सिन्धु’ अथाह !!


यों तो ‘पिया’ अरूप’ है, धरता रूप अनेक |
मिलता है उस ‘रूप’ में, जिसकी जैसी चाह ||
उस ‘अनाम’ के ‘नाम’ भी, अगणित और अनन्त |
राम ,कृष्ण या बुद्ध या, खुदा या कि अल्लाह ||
“प्रसून” मेरा ‘यार’ है, ‘रंग’ और ‘गुण’-हीन |
‘वह’ उस को वैसा दिखे, जैसी रखे ‘निगाह’ ||

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(ख)मेरा ‘पिया’ |
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‘कुरूप’ या ‘सुन्दर’ सभी, ‘रूपों’ का है अन्त |
मेरा पिया ‘अरूप’ है, ‘शाश्वत’ और ‘अनन्त’ ||
जो ‘पनपा’, ‘जर्जर’ हुआ, हुआ उसी का ‘नाश’ |
‘अजर-अमर’ मेरा ‘पिया’, व्यापे दिशा-दिगन्त ||
जीव-जन्तु या तुच्छ जड़, जंगम बड़े विशाल |
गरीब हो या अरब-पति, ‘वही’ सभी का ‘कन्त’ ||



सब ‘उस’ ने पैदा किये, डाल ‘स्वयम’ का ‘अंश’ |
जन साधारण या क्षुद्र हो, या हो धन-यशवन्त ||
ज्ञानी, मुल्ला-मौलवी, ‘उसे रहे सब खोज |
पीर-पुजारी,पादरी, पण्डित पॉप महन्त ||
“प्रसून”, ‘उस’ के सामने, ‘राज-कण’-पर्वत-बीच |
बड़े देश का भूप या, बहुत बड़ा सामन्त ||

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4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (10-01-2014) को "चली लांघने सप्त सिन्धु मैं" (चर्चा मंच:अंक 1488) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. सभी पधारे मित्रों को शुभ्काल !एवं धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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