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गुरुवार, 8 नवंबर 2012

मुकुर(यथार्थवादी त्रिगुणात्मक मुक्तक काव्य) (च )घट-पर्णी (५) इस ‘घटपर्णी’ को पहँचान !






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कितने ‘सुन्दर फूल’ हैं इसमें !

विष वाला रस भरा है जिस में ||

‘छल’ है इस के ‘मधुर स्वरस’ में |

‘कीट’ अगर फँस जाये इस में ||

‘मौत’ उतर जाये ‘नस-नस’ में |

बच जाये, है किस के बस में ||

बच न सकेगी उस की जान ||

इस ‘घटपर्णी’ को पहँचान !!१!!


कई लोग इस ‘घट पर्णी’ से |

दुःख देते अपनी ‘करनी’ से ||

ऊपर से लगते अति नीके |

किन्तु ‘भार’ हैं ‘इस अवनी’ के ||

मीत हैं ये बस ‘बनी-बनी’ के |

‘मीत’ नहीं होते ‘बिगड़ी’ के ||

‘सब के दर्दों’ से अनजान ||

इस ‘घटपर्णी’ को पहँचान !!१!!


‘पाण्डित्य’ का ‘ढोंग’ कर रहे |

‘षटरस व्यंजन’ भोग कर रहे ||

‘माया का उपभोग’ कर रहे |

किन्तु ‘प्रकट’ में ‘योग’ कर रहे ||

कहते, “हम ‘सहयोग’ कर रहे | 

हम सब का ‘हर रोग’ हर रहे” ||

ये ‘कितने ढोंगी इंसान |

इस ‘घटपर्णी’ को पहँचान !!२!!


“महँगाई को दूर करेंगे” |

‘अब की बार’ ज़रूर करेंगे ||

भारत को ‘मशहूर’ करेंगे |

भैया, सब की पूर करेंगे ||

‘प्रगति-बजट’ मंजूर करेंगे |

‘अन्धेरे’ में ‘नूर’ भरेंगे” ||

‘जुगनू’ जैसी इन की ‘शान’ ||

इस ‘घटपर्णी’ को पहँचान !!३!!


हार गया ‘पाखण्ड’ है इन से |

कौन बड़ा ‘उद्दण्ड’ है इन से ||

कौन बड़ा ‘मुस्टंड’ है इन से |

पाया सब ने ‘दण्ड’ है इन से ||

‘संकट’ मिला ‘प्रचण्ड’ है इन से |

हारा ‘स्वयम् घमण्ड’ है इन से ||

साक्षात् हैं ये हैवान ||

इस ‘घटपर्णी’ को पहँचान !!४!!


जहाँ ‘कलह की आग’ लगाते |

वही ‘शान्ति की अलख’ जगाते ||

‘अड़ियल कुक्कुट’ पाल चुगाते |

उन को आपस में लड़वाते ||

फिर उन की ये ‘सुलह’ कराते |

‘दोनों के ‘दादा’ कहलाते ||

‘तोड़-फोड़ के ये शैतान’ ||

इस ‘घटपर्णी’ को पहँचान !!५!!


‘विष-पादप’ के सभी “प्रसून” |

इन में ‘खूनी’ भरा ‘जूनून’ ||

इन के मुहँ को लगा है ‘खून’ |

महज़ ‘नाश’ इन का ‘क़ानून’ ||

‘पर हिंसा’ में इन्हें सुकून |

इन से बगिया है आरून ||

ढूँढो इन का ‘कोई निदान’ ||

इस ‘घटपर्णी’ को पहँचान !!६!!


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1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (11-11-2012) के चर्चा मंच-1060 (मुहब्बत का सूरज) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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