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गुरुवार, 23 अगस्त 2012

शंख-नाद(एक ओज गुणीय काव्य)-(द) -जागरण गीत--(२) !! नींद छोड़ कर जागिये !!


 

कर्म से मुहँ मोड़ कर,दूर मत भागिये !

भारत-निवासी,नींद छोड़ कर जागिये !!
   
  !!!!!!!*****!!!!!!!!*****!!!!!!!!

 
स्पर्धा कीजिये,पर द्वेष हीन कीजिये !
ईर्ष्या है ज़हर,इसे आप मत पीजिये !!
निज सुख साधनों के लिये यत्न करें किन्तु-
दुःख,दर्द दूसरों के देख कर पसीजिये ||
ऐश करने के लिये कैश न बटोरिये |

लूटिये-चुराइये न, ठगिये न मांगिये !!१!!

  

  
‘शकुनि’, औ ’आम्भीक’,’जयचंद’न होइये !
‘केसर’ के खेत में न ‘नागफनी’ बोइये !!
यारी, ऐयारी या किसी भी मक्कारी से –
‘गद्दी’,’कुर्सी’मिले इसी सोच में न रोइये !!
बन कर आतंकवादी,सौदा कर शत्रु से –
‘अपनों’के सीने पर,गोलियाँ न दागिये !!२!! 

‘तन्त्र’,’मंत्र’की ठगी की झाड़ियाँ उखाड़िये !
प्रेम,भक्ति,श्रद्धा,निष्ठा-‘पादपों’ को गाड़िये !!
‘आस्था’के ‘बाग’में ‘पाखण्ड’हैं ‘विषैले झाड़’-
कर के जतन कुछ, इनको उजाड़िये !!
चुभते हैं घिसे-पिटे रीति औ रिवाज़ कई –
अर्थ हीन हो गये हैं उन्हें आज त्यागिये !!३!!
   
एक दूसरे से मुहँ, ऐसे मत मोड़िये !

जिद्द बुरी आपस में लड़ने की छोड़िये !!

‘स्वार्थ’,’लोभ’,’वैर’’दम्भ’,’छल’के पंजे से-

‘एकता’की ‘माला’ के “प्रसून” मत तोड़िये !!

शत्रुता को भूल कर,पास आये शत्रु भी तो-

अंक में लपेट-भेंट गले जा के लागिये !!४!!

 

बुधवार, 22 अगस्त 2012

शंख-नाद(एक ओज गुणीय काव्य)-(द) -जागरण गीत-(१) !! मेरे भैया !!




$*$*$*$*$


       
    
     (१)

 !! मेरे भैया !!

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गली गली ‘अलख’जगाओ मेरे भैया !
दिलों में से‘अलस्’भगाओ मेरे भैया !!
‘प्रेरणा’ के गीत कुछ गाओ मेरेभैया !!!
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
झूठे झूठे,मीठे मीठे सपनों में खोई हुई |
‘चेतनायें’चादरों को ताने हुये सोई हुई ||
‘नीलगायों’ ने खाईं जो’फ़सलें थीं बोई हुईं |||
टूटे नींद ‘भ्रमों’ की जो, ‘बोध’का,’प्रबोध’ का-
तुम कोंई ‘बिगुल’ बजाओ, मेरेभैया !
सुर ‘जागरण’के सजाओ,मेरे भैया !!
एक जुट हो के आ जाओ,मेरे भैया !!!
गली गली ‘अलख’जगाओ मेरे भैया !!१!!
 
‘भ्रष्टाचारों की भट्टी’में जली सारी दुनियाँ |
खाये,‘ज़हर,’जान ‘मिस्री-डली’सारी दुनियाँ ||
मैली मैली ‘पंक’ में है गली सारी दुनियाँ !!!
हो गया है कुण्ठित,’विवेक अच्छे बुरे’ का |
‘नीकी राह’ इसको सुझाओ,मेरेभैया !
इसे समझाओ औ बुझाओ,मेरे भैया !!
‘दीप’मत ‘ज्ञान’ का बुझाओ,मेरे भैया !!!
गली गली ‘अलख’जगाओ मेरे भैया !!२!!
  

‘दानवों’ने ओढ़े हैं ‘मुखौटे’ ’देवताओं’के |
‘झोंके’चले‘पापों’की विषैली सी‘हवाओं’के ||
हो गये,’सुगन्धहीन ‘बाग’’ भावनाओं’के |||
साहसी लोगों के हाथों के हाथों को दो मजबूतियाँ-
कोई अब हिम्मत जुटाओ,मेरे भैया !
पड़े हुये ‘पर्दे’उठाओ,मेरे भैया !!
शंकाओं की ‘धुन्ध’हटाओ,मेरे भैया !!!
गली गली ‘अलख’जगाओ मेरे भैया !!३!!

‘प्रतिभाओं’से न होना कभी अनजान से |
‘हीरे’ढूँढ कर लाओ,’कोयले की खान’से ||
उनको तराशो और,’दृढता’की‘सान’से !!!
‘प्यार के धागे’ में और एक एक करके-
उन्हें गूँथ‘मालाएँ’बनाओ, मेरे भैया !
भारतके गले में पहनाओ, मेरे भैया !!
रूठी हुई ‘मैया’,मनाओ, मेरे भैया !!!
गली गली ‘अलख’जगाओ मेरे भैया !!४!!

कदाचारियों में भे होंगे कई सदाचारी भी |
‘इन्हींआम लोगों’में ही होंगे ‘अवतारी’भी ||
होंगी इनमें कई खूबियाँ हमारी भी |||
नगर नगर गाँव गाँव जाओ, मेरे भैया !
डगर डगर जा कर मंझाओ, मेरे भैया !!
‘निराशा’में ‘आशा’उपजाओ, मेरे भैया !!!
गली गली ‘अलख’जगाओ मेरे भैया !!५!!
 
देखो,कठिन हुई‘रीति’,‘प्रीति’की निभानी है |
‘धूप’ जैसे ताप मिले,सूख गया ‘पानी’ है ||
 बड़ी पीड़ा भरी इन ‘नयनों’ की कहानी है |||
‘निष्ठा’ भरे ‘प्रेम’ के ‘नीर‘ की बहाओ धार !
मर रही नमी को जिलाओ, मेरे भैया !
‘पानी’ जी भर पिलाओ, मेरे भैया !!
‘रेत’ में “प्रसून” फिर खिलाओ, मेरे भैया !!!
गली गली ‘अलख’जगाओ मेरे भैया !!६!!
 

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

शंख-नाद(एक ओज गुणीय काव्य)-(स) प्रेरण -(३) पथ पर होना मत विकल !


पथ पर होना मत विकल!



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तूफानों से बच निकल !



पथ पर होना मत विकल !!




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तम से तुम न हताश हो !


रंच न अरे निराश हो !!


करो यत्न,तुम करो श्रम !


बदलेगा यह काल-क्रम || 


मिट जाएगा अखिल भ्रम |


फूलेगा आशा का द्रुम ||




सबल तुम्हारी बाँह है |

धमनी में सु-प्रवाह है  ||





युग को तुम दोगे बदल |


लेकर तुम निश्चय अटल ||


लो विचार प्रति पल नवल !


पथ पर मत होना विकल !!१!!




एक नया विशवास ले |

आस भरी हर साँस ले ||




बाधाओं से हो निडर |


साहस, शक्ति संजो कर ||


तपो -ताप से तुम निखर |


ज्ञान-किरण बन कर बिखर ||




पैनी अगर निगाह है |

निष्कंटक  हर राह है ||




यदि इच्छाएं हैं प्रबल |


तुमको क्यों होना विचल ??


चलो, गिरो मत, तुम ,सँभल |



  पथ   पर मत होना विकल !!२!





प्रगति चढ़ाई पर चढो !

बढ़ो ! बढो !! आगे बढ़ो !!!



हो कर चौकन्ने सजग |


फूँक फूँक कर धरो डग ||


समझो अपना अखिल जग |


किन्तु न अपना तजो  ढंग ||



चारों ओर ' गुनाह' है |

निर्झर पाप- प्रवाह है ||



मोह, द्रोह में तू न जल !


बन कर 'सावन-सरस-जल' ||


सींच 'पाप-सन्त्प्त थल !


पथ   पर मत होना विकल !!३!




"प्रसून" काँटों में खिलो !

निर्जन बाटों में खिलो !!


हर राही को महक दो !

हर 'कोकिल' को चहक दो !!

हर 'भँवरे' को प्यार दो !

'हास' भरे उपहार दो !!


उर में यदि कुछ चाह है |

कुली हुई हर राह है || 


बाधा में मत मन बदल !

वीराना हो मरुस्थल ||

खिलो 'पंक'में बन 'कमल' |

पथ   पर मत होना विकल !!४!

























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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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