Blogger द्वारा संचालित.

Followers

नव गीत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नव गीत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 26 जनवरी 2013

गणतन्त्र के उपहार | (गणतन्त्र दिवस पर विशेष कटु सत्य प्रस्तुति)



================
आओ गिनायें हम तुम्हें ‘गणतन्त्र के उपहार’ !
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
पाँच वर्षों तक ‘प्रतीक्षा’ से जुड़े ‘अनुबन्ध |
वोट पाने के लिये खाई गई सौगन्ध ||
झूठ-छल से भरा कितना ‘चुनावी बाज़ार’ |
बन चुका ‘राजा-प्रजा का प्रेम’ यों ‘व्यापार’ |
आओ गिनायें हम तुम्हें ‘गणतन्त्र के उपहार’ !!१!!


काटते ‘विशवास’ का ‘सर’ ‘बुद्धिजीवी लोग’ |
और ‘शोषण-जीभ’ से कर ‘रक्त’ का उपभोग ||
हैं वस्त्र के भीतर छुपाये, ‘कपट की तलवार’ |
कर रहे, ‘बलि-पशु’ कटे ज्यों, ‘आपसी व्यवहार’ ||
आओ गिनायें हम तुम्हें ‘गणतन्त्र के उपहार’ !!२!!

 
मिलें ‘राशन’ की जगह, ‘भाषण के मीठे बोंल |
हर ‘तराजू’ रही है ‘अन्याय’ कितना तोल !!
इन ‘रूपधर बहुरूपियों’ से कौन पाये पार !
तोलते जो ‘न्याय’, लेते आज डंडी मार ||
आओ गिनायें हम तुम्हें ‘गणतन्त्र के उपहार’ !!३!!

 

‘व्यवस्था’ की ‘प्रगति-माला’ हो चुकी अब भंग |
है ‘नीति-डोरी’ से जुड़ी ‘प्रतिघात की पतंग’ ||
हुये, ‘वितरक’ ‘लोभ, तृष्णा-रोग’ से बीमार |
भूल कर कर्तव्य, सब के ‘हक़’ रहे हैं मार ||
आओ गिनायें हम तुम्हें ‘गणतन्त्र के उपहार’ !!४!!
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

रविवार, 16 सितंबर 2012

हिन्दी–पखवाडा (हिन्दी भाषा- साहित्य के सम्मान में रचनाएँ) ** (४)** !!फिर भी हिन्दी जिन्दा है!!

सारे चित्र 'गूगल-खोज' समूल चित्रकारों को सधन्यवाद -उद्धृत ---


!!फिर भी हिन्दी जिन्दा है!!



===================

 

‘नीति का नाटक’ गन्दा है |

फिर भी हिन्दी जिन्दा है ||

***===+++***===+++===

‘भारी भरकम पापों’ का |

‘कर्मों के सन्तापों’ का ||

सिर पर लदा पुलन्दा है |

फिर भी हिन्दी जिन्दा है ||१||


 

‘सदाचार के मोती’ का |

‘दीप’ की ‘जगमग ज्योति’ का-

भाव ज़रा सा मन्दा है |

फिर भी हिन्दी जिन्दा है ||२||


 


ए.सी.और कूलरों में |

‘पाउंड’और ‘डालरों’ में ||

बिका हुआ हर बन्दा है |

फिर भी हिन्दी जिन्दा है ||३||


 

 


जगमग जगमग चमक रहा |

युगों युगों से दमक रहा ||

जैसे सूरज-चन्दा है |

ऐसे हिन्दी जिन्दा है ||४||


 


‘आन’ खो चुका है अपनी |

‘शान’ खो चुका है अपनी ||

‘यह सोने का परिन्दा’ है |

फिर भी हिन्दी जिन्दा है ||५||



चारों ओर ‘बज़ारों’ में |

‘व्यवसायों’,’व्यापारों’ में ||

पनपा काला धन्धा है |

फिर भी हिन्दी जिन्दा है ||६||


 


उलझी ‘मान-विमर्दन’में |

“प्रसून”,‘इसकी गरदन में ||

पड़ा ‘विदेशी फन्दा’ है |

फिर भी हिन्दी जिन्दा है ||७||


 


$$&&**++==++**&&a

About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

मेरे सभी ब्लोग्ज-

प्रसून

साहित्य प्रसून

गज़ल कुञ्ज

ज्वालामुखी

जलजला


  © Blogger template Shush by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP