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गुरुवार, 23 मई 2013

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (ड) मीनार(विकास की ऊपरी ऊंचाई )(१) उत्पीडन का सूद


iइस सर्ग में यह बताया है कि विकास की मीनार बहत ऊंची, चमक दमक वाली शानदार है किन्तु भीतर से खोखली इन आचरण निष्ठा (वफ़ा) आदि  ठोसत्व के कारण बहुत कमज़ोर हैं | यानी विकास बनावटी है |
केवल भौतिक पादार्थिक (materialistic) विकास ही क्या विकास है जब कि आध्यात्मिक मानसिक  सांस्कृतिक विकास में  बनावटीपन है जो कि व्यवहारों में झलकता है | (सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)



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‘प्रगति की मीनारें’ उठीं, चलीं ‘गगन’ के पार |
क्यों  यह नारी  सह रही, है ज़ुल्मों की मार ??
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अनपढ़  ‘दहेज़’  माँगते,  तनिक न आती लाज ||
‘भोली कलियाँ’ चढ़ गयीं, इस  ‘दहेज़’ की भेंट |
‘कोमलता की लता’ का, हुआ  है  मटियामेट ||
हमने भरे  हैं ‘स्नेह  के, आँचल’  में  ‘अंगार’ |
क्यों यह नारी सह रही, है ज़ुल्मों की मार ??१??


कभी ‘धर्म’ के नाम पर, पति  को कह ‘परमेश’ |
‘पतिव्रता’  इस  को  बना,  देते अघोर क्लेश ||
'गृहिणी'  का  ‘संसर्ग’  तज,  ‘वेश्या-गामी’ लोग |
‘गन्दी गालियाँ, ढूँढ कर, करते ‘तन’ का भोग ||
दबी दबी सहमी हुई, खो कर  निज ‘अधिकार’ |
क्यों यह नारी सह रही, है ज़ुल्मों की मार ??२??


‘कालगर्ल’  बन  वेश्या’  रही  ‘बदन’  को  बेच |
‘लज्जा - रक्षक  डोरियाँ’,  रहे  ‘अधर्मी’  खेंच ||
‘काम-भोग’  का  ‘मूल धन’,  ‘उत्पीडन का सूद’ |
‘काम - कला  के  महाजन’,  बसूलते  ‘मरदूद’ ||
यों  ‘जीवन  की  विवशता’,  सहती  ‘यौनाचार |
क्यों यह नारी सह रही, है ज़ुल्मों की मार ??३??






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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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