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मंगलवार, 1 जनवरी 2013

सामयिकी(५) बीत गये इस वर्ष में |(एक कटु सत्य)

मैंबीते वर्ष की 'वधाई', 'झूठ' का मुलम्मा' चढ़ाकर कैसे दूं ? सारा देश  जिन पीडाओं से कराहता रहा उन का सच्चा कच्चा चिट्ठा आपके सामने है |

(सारे चित्र 'गूगल-खोज'से साभार)
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‘चिन्तन-मनन’ करें हम थोड़ा, देखें कुछ टटोल कर-
‘क्या खोया,क्या पाया हमने’, बीत गये इस वर्ष में|
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हुये ‘प्रयास हज़ारों, लाखों’, नित नव यहाँ ‘सुधारों’के |
फिर भी सक्रीय रहे ‘धूर्त जन’, ‘अनुगामी कुविकारों‘ के ||
और उन्हीं की ‘पौवारह’ थी, उठा के सिर वे जिये यहाँ-
‘अपराधों के रंग’ में रंगते रहे ‘पृष्ठ अखबारों के |
‘अज्ञानी’ सुधारे न ‘ज्ञान’ के देखे ‘बोल’ बोल कर-
‘प्रश्न-चिन्ह’ लग गया हमारे ‘सामाजिक उत्कर्ष’ में ||
‘चिन्तन-मनन’ करें हम थोड़ा, देखें कुछ टटोल कर-  
‘क्या खोया,क्या पाया हमने’, बीत गये इस वर्ष में ||१||

 
‘उत्पादन के पवन पुत्र से बाज़ारों’ पर छाई थी |
मुहँ फैलाये ‘डायन सुरसा’ सी ‘अड़ियल महँगाई’ थी ||
‘खूनी पंजे राजनीति के’, ‘योजनाओं के पंख’ लिये-   
‘अरमानों के कबूतरों’ पर, ‘चील’ सी यह मंडराई थी ||
‘जन-मन-खंजन’ सहमे, दौड़ी ‘भूखी चोंच’ खोल कर-
घुसीं ‘निराशा’ और ‘वेदना’, ‘आशाओं के हर्ष’ में ||
‘चिन्तन-मनन’ करें हम थोड़ा, देखें कुछ टटोल कर-  
‘क्या खोया,क्या पाया हमने’, बीत गये इस वर्ष में ||२||


‘कूटनीति’ के जमे अखाड़े, ‘जोश’ आ गया ‘मल्लों’ को |
‘नारेबाजी’ करने का कुछ, मिल गया ‘काम’ ‘निठल्लों’ को ||
किया ‘शिकार’ ‘भेड़ियों’ ने था, ‘माल माल’ सब चाट लिया-
बची खुची मिल गयी ‘गिज़ा’ फिर, कुछ ‘कूकर ‘दुमछल्लों’को||
बिन देखे, ‘क्या सच’ है, की ‘हाँजी-हाँजी’ दिल खोल कर-
‘भीड़-तन्त्र’ में रँग था फीका, ‘विश्लेषण-विमर्श’ में ||                ‘चिन्तन-मनन’ करें हम थोड़ा, देखें कुछ टटोल कर-  
‘क्या खोया, क्या पाया हमने’, बीत गये इस वर्ष में ||३||

‘कुवासना के पथ के गामी- कामी कुटिल पिशाच’, जगे |
जहाँ तहाँ ‘नारीत्व’ की उजली, ‘चूनरिया’  पर ‘दाग’ लगे ||
कई ‘कुमारी ललनाओं’ के ‘कौमार्य’ भी भंग हुये-
और ‘नीचता की वीणा’ में, बड़े ‘घिनौने राग’ जगे ||
‘कनाल-ताल’ में ‘सूअर’ नहाये, जी भर  ‘काम-किलोल’ कर-
‘मैली गन्ध’ मिल गयी ‘जल’ में, ‘हर कामी स्पर्श’ में ||
‘चिन्तन-मनन’ करें हम थोड़ा,  देखें कुछ टटोल कर-  
‘क्या खोया, क्या पाया हमने’, बीत गये इस वर्ष में ||४||

 


लेकर ‘पाप की जलती ज्वाला’, बढ़ कर आई ‘दानवता’ |
‘दिल्ली की बगिया’ में पहुँची, वहाँ जलाने ‘मानवता’ ||
‘नारी की लज्जा’ को रौंदा, ‘मर्यादायें’ रौंद सभी-
‘विकृत काम-पिशाच’ ने कुचली, ‘कौमार्य की स्नेह-लता’ ||
चीखा ‘मौन’, उठी ‘आवाजें’ ‘अपनी ताक़त’ तोल कर-    
‘विप्लव की आँधियाँ’ चल पड़ीं, पूरे भारतवर्ष में ||
‘चिन्तन-मनन’ करें हम थोड़ा, देखें कुछ टटोल कर-  
‘क्या खोया, क्या पाया हमने’, बीत गये इस वर्ष में ||५||

 

सारे वर्ष ‘शान्ति के नभ’ में, छाये ‘बादल काले’ |
मथते रहे ‘कमल-तालों’ को, ‘पाप के गज मतवाले’ ||
रिसती रहीं कई ‘पीडायें’ ‘नयन’ से ‘आँसू’ बन् कर-      
‘विडम्बना’ ने किया देश को, था ‘दर्दों’ के हवाले ||
‘प्रसून’ रोये ‘पीडा’ पीकर, ‘संयम-रस’ में घोल कर-
रो रो कर थक गये, तभी ‘दम’, आया है ‘संघर्ष’ में ||
‘चिन्तन-मनन’ करें हम थोड़ा, देखें कुछ टटोल कर-  
‘क्या खोया, क्या पाया हमने’, बीत गये इस वर्ष में ||६||

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रविवार, 30 दिसम्बर 2012

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

मुकुर(यथार्थवादी त्रिगुणात्मक मुक्तक काव्य)(झ)ऊँचे रिश्ते ‘प्यार’ के | (४) भरें ‘प्रीति’ से ‘प्रान’ रे ! (प्रसाद तथाओज गुण का समन्वय)


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चलो चलें, दो पल हम हँस लें-
भरें ‘प्रीति’ से ‘प्रान’ रे !
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‘सच्चे प्रेम’ को भूल, ‘काम’ से|
लिपटे ‘ऊँचे धाम’-‘दाम’ से ||
‘आत्मा’ की ‘अनुभूति’ नहीं है-
‘लुब्ध’ हुये हैं ‘हाड़-चाम’ से ||
‘प्रेम की परिभाषा’ से ‘मानव’-
है कितना अनजान रे !!
चलो चलें, दो पल हम हँस लें-
भरें ‘प्रीति’ से ‘प्रान’ रे !!१!!


 
केवल ‘जीने की चाहत’ है |
मात्र ‘निज भरण’ में ही रत हैं ||
‘जोंक’ और ‘खटमल’ की नाईं-
‘पर चिन्ता’ से दूर, ‘विरत’ हैं ||
‘पशु-बल’ से हम आज चाहते-
हैं होना ‘धनवान’ रे !!
चलो चलें, दो पल हम हँस लें-
भरें ‘प्रीति’ से ‘प्रान’ रे !!२!!

‘थोथी’, दाबे ‘बगल’, ‘पोटली’ |
‘जीने की हर बात’ खोखली ||
‘पीत-हरे, अधमरे पर्ण’ हैं-
‘पल्लव-मूल’ हैं हुई ‘पोपली’ ||
‘चमक-दमक’ ही, ‘मानवता’ की-
बनी हुई ‘पहँचान’ रे !!
चलो चलें, दो पल हम हँस लें-
भरें ‘प्रीति’ से ‘प्रान’ रे !!३!!

‘लोहा, ताँबा, मिट्टी, पत्थर’ |
‘काठ, काँच, औ कठोर कंकर’ ||
‘मुख्य’ हुये हैं, ‘गौण’ हुआ है-
‘भाव-भरा भावुकता-परिसर’ ||
‘जड़-निर्जीव यंत्र’ से भी-
तो सस्ता ‘इंसान’ रे ||
चलो चलें, दो पल हम हँस लें-
भरें ‘प्रीति’ से ‘प्रान’ रे !!४!!

 

राज़ी राज़ी या बरज़ोरी |
लूट लाट कर चोरी चोरी ||
जेब काट कर, मांग या ठग कर-
चाह रहे सब, ‘भरें तिजोरी’ ||
‘स्वर्ण-रजत’ से बिका हुआ है-
यह ‘लोभी इंसान’ रे !!
चलो चलें, दो पल हम हँस लें-
भरें ‘प्रीति’ से ‘प्रान’ रे !!५!!

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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