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मंगलवार, 13 अगस्त 2013

मंगल-गीत (५)गूँजें साँझ सकारे |

 
  ============== मन्दिर, मस्ज़िद, दरगाहें हों, या गिरजा, गुरूद्वारे |
‘इंसानियत के मंत्र-आयतें’, गूँजें साँझ- सकारे ||
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कोई विदेशी मज़हब की अब करे न यहाँ दलाली |
यहाँ दिलों में रहे सलामत, ‘निरपेक्षता की लाली’ ||
एक साथ हम सभी सुखों को सरे मिल कर बाँटें-
दुःख का करें सामना हँस कर, मिल जुल कर हम सारे |
‘इंसानियत के मंत्र-आयतें’, गूँजें साँझ- सकारे ||१||

किसी गली में हों न कहीं भी, ‘अनचाहे सन्नाटे’ |
दुःख  हों लेकिन उगें न उन में, ‘कुंठाओं के काँटे’ ||
अभाव से पीड़ित लोगों से, सुखी न मुहँ को मोड़ें-
रहें सुखों की झोली भरते, देश के लोग हमारे |
‘इंसानियत के मंत्र-आयतें’, गूँजें साँझ- सकारे ||२||

सब का अपने वेतन से ही, अब हो यहाँ गुजारा
‘घूस’ और ‘बेईमानी’ अब, यहाँ से करें किनारा ||
मत ‘दहेज़’ से पीड़ित हो कर, जीवन खोये नारी-
सारा भारत कमर को कस के, ‘अनाचार’ को मारे |
‘इंसानियत के मंत्र-आयतें’, गूँजें साँझ- सकारे ||३||

राम करे भारत में सुधरें, जमाखोर व्यापारी |
कहीं सताये भूख-प्यास की किसी को मत लाचारी ||
‘महँगाई की आग’ से झुलसें मत “प्रसून” आशा के-
मत कोई ‘भ्रष्टाचारों की भट्टी’ यहाँ पजारे |
‘इंसानियत के मंत्र-आयतें’, गूँजें साँझ- सकारे ||४||

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रविवार, 11 अगस्त 2013

मंगल-गीत (४) मंगल-गीत’ हमारे |


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दशा देश की बिगड़ी है जो, आकर ‘नियति’ सुधारे |
स्वर पहुँचें, ईश्वर तक गूँजें, ‘मंगल-गीत’ हमारे ||
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मत माफियों से मिले देश के किसी प्रान्त की सत्ता |
और ‘सियासत’ बने जुवे का नहीं ‘ताश का पत्ता’ ||
‘कूट-नीति बेईमानों की’ मत ‘ईमान’ को मारे |
स्वर पहुँचें, ईश्वर तक गूँजें, ‘मंगल-गीत’ हमारे ||१||

कहीं कोई ‘समुदाय’, ‘धर्म’ का ‘झूठा राग’ न गाये |
मत जनता में ‘स्म्प्रदायवादों’ की ‘आग’ लगाये ||
‘नया जागरण’, प्रजातंत्र’ का विकृत रूप सँवारे |
स्वर पहुँचें, ईश्वर तक गूँजें, ‘मंगल-गीत’ हमारे ||२||

‘प्रान्तवाद’ की ‘क्षेत्रवाद’ की आँच कहीं मत आये |
‘जातिवाद का रोग’ किसी के मन को अब न सताये ||
‘अखण्डता का चमन अमन का’, कहीं न कोई उजारे |
स्वर पहुँचें, ईश्वर तक गूँजें, ‘मंगल-गीत’ हमारे ||३||

रहा ‘गुलामी के रोगों’ से, पीड़ित ‘वतन का तन’ है |
त्यागी वैरागी वीरों ने, ‘मुक्ति’ का किया जतन है ||
अब ‘अनीति का नाग’ पातकी,  इस में ‘विष’ न उतारे |
स्वर पहुँचें, ईश्वर तक गूँजें, ‘मंगल-गीत’ हमारे ||४||

“प्रसून” सारे रंग विरंगे, एक बाग में खिलते |
अलग अलग ‘गन्धों के सुख’ हैं, इन से सब को मिलते ||
‘भेद-भाव का शूकर’, सुमन-पादपों को न उखारे |
स्वर पहुँचें, ईश्वर तक गूँजें, ‘मंगल-गीत’ हमारे ||५||
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शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

मंगल-गीत (३)बिगड़ी दशा सुधारे |


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दु:ख मत करें प्रवेश किसी भारतवासी के द्वारे |
’समय’ हमारे भारत माँ की बिगड़ी दशा सुधारे ||
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चन्दा बाँटे चन्दा बाँटे धुली चाँदनी मानो चाँदी पिघली |
बरसातों में किसी चमन को अब न उजाड़े बिजली ||
अमावसों में जलें दीप से झिलमिल झिलमिल तारे |
’समय’ हमारे भारत माँ की बिगड़ी दशा सुधारे ||१||

नदियाँ इसकी नित जल बाँटें, रहे धरा मत सूखी |
‘मनोभावना’ किसी ह्रदय में रहे न नीरस रूखी ||
युग युग तक सागर मेरे भारत के चरण पखारे |
’समय’ हमारे भारत माँ की बिगड़ी दशा सुधारे ||२||

असमय में ‘बरसात‘ बाढ़ से नाश के खेल न खेले |
या ‘अकाल’ का, ‘अनावृष्टि’ का दर्द न कोई झेले ||
अन्न-द रस ‘अमृत’ बरसाएँ, बस बादल कजरारे |
’समय’ हमारे भारत माँ की बिगड़ी दशा सुधारे ||३||

‘शरद’ सभी तालों में सुन्दर कमल-“प्रसून” खिलाये |
‘बसन्त’ उद्यानों में सुमनों के मन को महकाये ||
नाचें ‘तितली’ मोहक तान भरें ‘भँवरे’ मतवारे |
’समय’ हमारे भारत माँ की बिगड़ी दशा सुधारे ||४||
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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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