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शनिवार, 7 जुलाई 2012

शंख-नाद(एक ओज गुणीय काव्य)- (ब)आव्हान -(१)क़दम बढ़ा कर आगे आओ !

           
क्रान्ति-पंथ पर क़दम मिला कर आगे आओ !
गिरते हुयेमूल्य संस्कृति के, इन्हें उठाओ !!
  
पंकिल धूमिल जिनके मन का कोना कोना |
जिनके तन पर चुभता है गुदगुदा बिछौना ||
चाह रहे जीवन में बोना चाँदी सोना |
खेल रहे षड्यंत्र भरा जो खेल घिनौना ||
हीरे,मोती,पन्ना, भूषण जिनके ईश्वर-
जीवन का यह सत्य नहीं है इन्हें बताओ !
क्रान्ति-पन्थ पर क़दम मिलाकर आगे आओ ||(१) 
 
'शीश- महल'में खड़े हुये बेईमानों के |
शोषण करने वाले पापी धनवालों के ||
जो कच्चेजुबान के कच्चे कानों के 
तोड़ो इनके जाल छद्म तानों बानों के ||
भटक चले जो मानवता के पुण्य-पन्थ से -
उँगली पकड़ो उन की, उनको पन्थ दिखाओ ||
क्रांति-पन्थ पर क़दम मिला कर आगे आओ !!२!!
    
 
मन में जिनके काँच, चाहतों में हैं हीरे |
सुलग रहे लालच भट्टी में धीरे धीरे ||
मन में जिनके काँच, चाहतों में हैं हीरे |
जिनकी कृत्रिम और खोखली सभी खुशी रे || 
उनको अन्त:सुख का रहस्य तनिक बता कर -
जटिल कामना के बन्धन से मुक्त कराओ ||
क्रान्ति पन्थ पर क़दम बढ़ा कर आगे आओ ||३||
  
जिनके घर हों बने रेत की दीवारों के |
उनके हाथों के पत्थर की बौछारों के ||
उत्तर दो, कस कमर, अरे इन मक्कारों के |
निपट नासमझ ऐसे मन के बीमारों के ||
फँसे हुये जो 'काम' लोभ,मद की कीचड में-
गीता का निष्काम कर्म का पाठ पढ़ाओ ||
क्रान्ति पन्थ पर क़दम बढ़ा कर आगे आओ ||४||  




मंगलवार, 3 जुलाई 2012

शंख-नाद (एक ओज-गुणीय काव्य) (अ)वन्दना (४)-राष्ट्र-वन्दना



हे भारत राष्ट्र जगो!जगो!!

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
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आलस्य और अघ तजो तजो !

हे भारत राष्ट्र ,जगो! जगो!! 

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तुम फूंको शंख प्रेरणा का |



गाओ नव राग चेतना का ||

'अनुचित परिवर्तन'के घन ने -

बरसाया नीर वेदना का ||

'संस्कृति' का तन है दुखा-दुखा |  

देखा इसका मन बुझा बुझा ||

इस प्राणों में तन्द्रा है | 

नयनों में मद है,निद्रा है ||

यह निद्रा औ तन्द्रा टूटे -

बन कर के भेरी बजो बजो ||

हे भारत राष्ट्र! जगो जगो !!१!!

       


'अविवेक' ने जाल बिछया है |

अज्ञान का खेल रचाया है ||

मानव को दास बना कर के -

उँगली पर इसे नचाया है ||

मन बुद्धि पे नीरस पत्थर हैं |

व्यवहार हुए अति बर्बर हैं ||

चेतना सुन्न ज्यों किये नशा |

इस चमक-दमक में फँसा फँसा ||

'अविवेक' शत्रु से लड़ने को -

शस्त्रों-अस्त्रों से सजो सजो ||

हे भारत राष्ट्र जगो जगो !!२!!   
   

अपनी गरिमा को पहचानो |

तुम जगद्गुरु थे यह जानो ||

यह विश्व तुम्हारा अनुगत था 

 तुम अग्रेसर थे यह मानो ||

तुम थे "प्रसून" नंदन वन के |

दे कर सुगन्ध जग में महके ||

सारे जग में डंका बजता |

जो भी सुनता पीछे चलता ||

अपनी वह शक्ति बटोरो फिर - 

इतिहास पुराना रचो रचो || 

हे भारत राष्ट्र जगो जगो !!३!!

   

  

शुक्रवार, 29 जून 2012

शंख-नाद (एक ओज-गुणीय काव्य) (अ)वन्दना -(३) गुरु-वन्दना -- हे गुरु! ज्ञान बिखेरो जग में

 

हे गुरु !ज्ञान बिखेरो जग में !

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
  

उपदेशक  माया में लिपटे |

ज्ञान की चादर में सिलबटें ||

चिंतन, मनन संकुचित कितने !

बोध-मन्त्र हैं सिकुड़े, सिमटे ||

मानव के मन की पाटी में -

'प्रेरण'-शब्द उकेरो जग में !!

हे गुरु ज्ञान बिखेरो जग में!!१!! 

         

कितने लोभी धर्म-प्रचारक !

धन से बिके हैं आज विचारक ||

व्यवसाई हो गये हैं देखो-

इस सामाज के कई सुधारक ||

शंख बजा कर,अलख जगाकर -

सोये हुओं को टेरो जग में ||

हे गुरु ज्ञान बिखेरो जग में !!२!!

    

तुम "प्रसून"की गुहार सुन् लो|

गुरुवर,मन की पुकार सुन् लो !!

बिगड़ाहै परिवेश जगत् का-

कर दो थोड़ा सुधार सुन् लो !!

वशिष्ठ,कौटिल्य,कबीर, गोरख!

मन्त्र मोहिनी फेरो जग में ||

हे गुरु ज्ञान बिखेरो जग में !!३!!

 
    



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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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