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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

नयी करवट(दोहा-ग़ज़लों पर एक काव्य) (१२) काल-बोध(क) विगत वर्ष की विदाई |

(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)
सभी मित्रों को 'विगत वर्ष की विदाई' की शुभ कामना !! 

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आयेगा ‘नव वर्ष’ कल, गया ‘पुराना’ बीत |
आओ ! मिल कर हम सभी, गायें ‘मंगल-गीत’ !!
‘निष्ठा-वीणा’ में जुड़े, ‘तार’ बनें ‘व्यवहार’ !
‘सुख-सरगम’ जीवन्त हों, बजे ‘स्नेह-संगीत’ ||

रहे ‘पूस’ के मॉस में, एक ‘विरोधाभास’ !
‘गरम जोशियाँ’ ‘ठंड’ से, कहीं न जायें शीत !!  
अगर ‘प्रेम के दूध’ में, आये कभी ‘खटास’ |
‘‘दूध’ फट गया है’ कभी, ऐसा हो न प्रतीत !!


‘आत्म-चिन्तन’, ‘दधि’ बने, ‘मथनी’, ‘प्रीति-सुनीति’ !’
‘विशलेषण’, ‘मन्थन’ बने, मिले ‘स्नेह-नवनीत’ !!


आचरणों के बाग’ में, सुन्दर खिलें “प्रसून” !
‘मधु’ औ ‘मीठी गन्ध’ के, ‘घट’ मत जायें रीत !!

 

 मेरे ब्लॉग 'प्रसून' पर भी  'विगत वर्ष की विदाई' पर आप का स्वागत है  !  


 


  

  

   



  
   






   

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

नयी करवट(दोहा-गीतों पर एक काव्य)(६)ढोल की पोल (घ)अधर्म-अफ़ीम

(सारे चिर्त्र 'गूगल-खोज' से साभार)
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आये हैं ‘शैतान’ कुछ, बन कर ‘राम-रहीम’ |

लगे हैं ‘बैनर’ धर्म के, बाँटें ‘अधर्म-थीम’ ||

अब ‘द्रौपदियाँ’ क्या करें, कहाँ बचेगी ‘लाज’ |

जब ‘दुश्शासन’ घूमता, कहता खुद को ‘भीम’ ||



हलवाई ‘अज्ञान’ के, रचें ‘ज्ञान-मिष्ठान’ |

रच कर ‘पेड़ा’ बेचते, भीतर भरे ‘अफ़ीम’ ||



‘कड़वाहट’ हैं भर रहे, ये ‘प्रवचन के सिद्ध’ |

‘वाणी’ में ‘मिसरी’ घुली, ‘व्यवहारों में ‘नीम’ || 

‘तोते’ कुछ ‘पाखण्ड’ के, रटते ‘पाप-कुमन्त्र’ |

‘कुतर्क’ कितने कर रहे, झूठी हर ‘तरमीम’ ||



इनके ‘झाँसे’ में फँसे, भोले कई “प्रसून” |

समाज भटका ‘भ्रष्ट पथ’, पनपे ‘पाप’ असीम ||



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 मेरे ब्लॉग 'प्रसून' पर, 'घनाक्षरी वाटिका' के षष्ठम् कुञ्ज(मिलन-पथ) में आप का स्वागत है |

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

नयी करवट(दोहा-गीतों पर एक काव्य)(६)ढोल की पोल(ग)कोयल निकला ‘काग’ |

(सारे चित्र 'गूगल-खोज'ए साभार )


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लगे ‘सन्तई’ में मलिन काले काले दाग |

‘छल-प्रपंच’ में रँगे हैं, वे तेरे ‘वैराग’ ||

तूने की ‘मनमानियाँ’, बन कर ‘सन्त’ महान |

हम समझे ‘कोकिल’ तुझे, पर तू निकला ‘काग’ ||



मन में तेरे ‘ज़हर’ था, ‘शकर-पगे’ थे ‘बोल’ |

हमें लुभाता रहा था, गा कर ‘झूठे राग’ ||

झूम झूम कर नाचता, करता था ‘सत्संग’ |

कर ‘सम्मोहन’ धर्म का, रचा ‘ठगी’ का ‘स्वाँग’ ||



 तूने दे दी थी हमें, कलुषित ‘ज्ञान-अफ़ीम’ |

उतर गया है अब ‘नशा’, ‘बोध’ गया है जाग ||

थीं, ‘भँवरों’ के वेश में, ‘बर्रें’ तेरे साथ |

“प्रसून” भोले फँस गये, छला गया था ‘बाग’ ||


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! 

           मेरे ब्लॉग 'प्रसून' पर, 'घनाक्षरी वाटिका' के षष्ठम् कुञ्ज(मिलन-पथ) में आप का स्वागत है |

  

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

क्रिसमस-दिवस(शान्त रस -अभिधा शब्द-शक्ति में गंगाजमुनी भाषा में भावोद्गार)

(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 
    (ब्याजोक्ति-प्रधान रचना) 

  
सन्त निकोलस की तरह, त्यागी हों ‘अलमस्त’ |

तो. दुनियाँ में कहीं फिर. रहे न कोई त्रस्त ||
‘अपनेपन’ का सभी से, जो रक्खे ‘व्यवहार’ |

‘प्रेम’ बढ़े संसार में, ‘नफ़रत’ होगी ध्वस्त ||
‘आस्था’ और ‘उदारता’, हैं ईश्वर के रूप |

‘समानता’ हो हर तरफ़, ‘भेद-भाव हों नष्ट ||

अन्न बढ़े हर देश में, करे पलायन ‘भूख’ |

भरें पेट भूखे सदा, रहें सदा आश्वस्त ||

‘लामकान’ पायें सभी, अब समुचित आवास |

सारी दुनियाँ की दशा, हर दिन रहे दुरुस्त ||
“प्रसून” अब हर ‘बाग’ में, खिलें, लुटाएं ‘हास’ |

‘पतझर’ उस से दूर हो, ‘बसन्त’ हो मत रुष्ट ||
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मेरे ब्लॉग 'प्रसून' पर 'ख्रीस्त-दिवस'   पर आप का स्वागत है !    

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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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