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शुक्रवार, 15 मार्च 2013

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (ख) मौसम का उत्पात |


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(१)पीले पत्ते
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‘भौतिक सुख’ छूने लगे, हैं ‘ऊँचा आकाश |
थोड़ा मन का भी करो, मेरे मित्र विकास ||
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‘मधुवन’ में ऐसा हुआ, ‘मौसम का उत्पात’ |
पीले होकर झर गये, ‘सुन्दर सुन्दर’ पात ||
‘स्वप्न-सरोवर’ पर हुआ, ’निर्मम उल्का पात‘ |
जले ‘कामना’ के सभी, ‘जलजातों के गात’ ||
सहमे सहमे थम गये, ‘कुमुदिनियों’ के हास |
थोड़ा मन का भी करो, मेरे मित्र विकास ||१!!



‘नागफनी’ आज़ाद है, है काँटों का राज |
मुरझाए ‘चम्पा-कुसुम’,और ‘मोगरे’ आज ||
‘हँस’ कहीं जा सो गये, जागा ‘गिद्ध-समाज’ |
इसी लिये तो हो गया, ‘आतंकों का राज‘ ||
‘अपनी छाया’ पर नहीं, रहा तनिक विशवास |
थोड़ा मन का भी करो, मेरे मित्र विकास ||२!!

‘नागफनी’ आज़ाद है, है काँटों का राज |
मुरझाए ‘चम्पा-कुसुम’,और ‘मोगरे’ आज ||
’हंस' कहीं जा सो गये, जागा ‘गिद्ध-समाज’ |
इसी लिये तो हो गया, ‘आतंकों का राज‘ ||
‘स्वतंत्रता-उद्यान’ में, ‘कलह’ ‘कंटीली घास |
थोड़ा मन का भी करो, मेरे मित्र विकास !!३!!



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बुधवार, 13 मार्च 2013

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (क) वन्दना (३) ^^राष्ट्र-वन्दना^^ (विराट वर्णन)




राष्ट्र, ‘समष्टि-ब्रह्म’ तू, पूज्य जैसे ईश !

तुझको कोटि प्रणाम हैं, विनत झुका कर शीश ||

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‘भौगोलिक परिवेश’ है, सुन्दर ‘तेरा शरीर’ |

नदियाँ ‘रक्त प्रवाहिनी’, ‘रुधिर’ सुपावन नीर ||

‘वायु’ तेरे ‘प्राण’ हैं, ‘पवन’  तेरी साँस |

संस्कृति ‘तेरी आत्मा’, मय ‘आस्था-विशवास’ ||

‘वैचारिक थाती’ है ‘मन’, ‘मस्तक तेरा’ गिरीश !

तुझको कोटि प्रणाम हैं, विनत झुका कर शीश ||१||



फलदायी है वरद है, तेरा रूप विराट |

मन में ‘आशा-ज्योति’ भर, ‘अन्धकार को छाँट ||

‘जगद्गुरु’ तू रहा है, मेरे भारत देश !

तूने दिये अतीत में, जग को नव संदेश ||

ज्यों ‘रजनी’ को दे सुखद, ‘धवल कान्ति’ रजनीश |

 तुझको कोटि प्रणाम हैं, विनत झुका कर शीश ||२||



हो कर ‘शुद्ध हृदय-मन’, ‘अहंकार’ को मेट |

अर्पित सेवा में तेरी, यह ‘काव्य की भेंट ||

‘तेरे प्रेरण’ से भरे ,’मेरे मुक्त विचार’ |

जन जन में ये कर सकें, ऊर्जा’ का संचार !!

दो “प्रसून” को अब प्रभु, अपना यह आशीष !

तुझको कोटि प्रणाम हैं, विनत झुका कर शीश ||३||



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मंगलवार, 12 मार्च 2013

झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (क) वन्दना (२)गुरु-वन्दना





हे ईश्वर तुम ही मिलो,ले कर गुरु का रूप!
गुरु तुम्हारी ‘शक्ति’ है,’ जगमें परम अनूप !!  

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बिना तुम्हारे विश्व में, कौन है मेरे साथ ?

दो आशीष मुझे प्रभु, रख कर सर पर साथ !!

जिस पर गुरु का हाथ हो, होता वह निष्पाप |

उस का ‘तीनो शूल’ का, मिट जाता सन्ताप ||

ज्यों  छाता  करे, हरे ‘जेठ की धूप’ ||

गुरु तुम्हारी ‘शक्ति’ है’ जग में परम अनूप !!१||


‘चाल कुचाली’ चल चुका, हे गुरु ‘काल-कुचक्र’ |

सारे भारत पर पड़ी, दृष्टि ‘नियति’ की वक्र ||

प्रभु तुम्हीं तो राष्ट्र हो, तुम ही अखिल समाज !

इस समाज को ग्रस लिया, ‘कर्क रोग’ ने आज ||

‘कड़वा काव्य’ नीम सा, है औषधि स्वरूप |

गुरु तुम्हारी ‘शक्ति’ है’ जग में परम अनूप !!२||




यद्यपि लगती है बुरी, पीड़ा देती चोट |

पर ‘कुम्हार’ की चोट से, हरता ‘घट’ का खोट ||

चोट से हिलते जब कभी, हैं ‘वीणा’ के तार |

उपजा करती है तभी, ‘मधुर मधुर झंकार’ ||

और हाथ की चोट से, फटके ‘अन्न’ को ‘सूप’ |

गुरु तुम्हारी ‘शक्ति’ है’ जग में परम अनूप !!३||








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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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