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सोमवार, 17 दिसंबर 2012

मुकुर(यथार्थवादी त्रिगुणात्मक मुक्तक काव्य) (ट)विराग- गीत | (२)चोट पर चोट | (यथार्थ-दर्पण)

'अच्छाइयों' के साथ बुराइयां'भी बढती है, यह ठीक ही है क्यों कि यह 'प्रकृति'का नियम है | यह सन्तुलन बना रहे,तो अच्छा है | किन्तु यदि 'अच्छाई' की तुलना में 'बुराई' कई  गुना बढ़ जाये, तो चलेगा क्या?यह असन्तुलन ठीक वैसा ही है जैसे,बोये गये अन्न-बीजों के साथ 'खरपतवार' 'फसल' से की गुना बढ़ कर 'फसल' ही चौपट कर दे | (चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 



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हम तो ‘चोट’ पर ‘चोट’ खाने लगे |
‘नयनों’ में औ ‘अश्रु’ आने लगे ||
‘दर्द भरे गीत’ विवश गाने लगे ||
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‘मौसमों’ ने बदली आज ऐसी ‘नज़र’ |
ले आई ऐसा आज ‘बदली’, ‘कहर’ ||
‘नभ’ से गिरी ‘करुणा की धार’ ज़ार ज़ार |
हुआ नहीं ‘ऊसर’ में रंच भी सुधार ||
‘सुमनों’ के ‘मनों’ को सताने लगे |
‘बागों’ औ ‘वनों’ को सताने लगे ||
‘काँटों की फसलें’ उगाने लगे |
हम तो ‘चोट’ पर ‘चोट’ खाने लगे ||१||


‘रोशनी’ के ‘प्यासों’ की देखिये ‘समझ’ |
लोग हो गये हैं आज कितने ‘नासमझ’ !!
‘ज्योति’ की तलाश में सारा ‘संसार’ |
बुन लिया किन्तु ‘चारों ओर’ ‘अन्धकार’ ||
‘जुगुनुओं के गाँव’ जगमगाने लगे |
‘तारों के पाँव’ डगमगाने लगे ||
‘चन्दा’ को ‘दाँव’ पर लगाने लगे |
हम तो ‘चोट’ पर ‘चोट’ खाने लगे ||२||

‘प्रणय-दान’ कैसे करें ‘सजनी-सजन’ !
बहुत कठिन हो गया है ‘सुख मय शयन’ ||
चढ़ गये हैं ‘आसमान’ पर यहाँ ‘बजार’ |
‘चाहत की भूख’ और है ‘बेशुमार’ ||
‘मन-विहंग’ पंख फड़फड़ाने लगे |
‘मधुर स्वप्न’ तोड़ कर जगाने लगे ||
‘निराशा के दर्द-गीत’ गाने लगे |
हम तो ‘चोट’ पर ‘चोट’ खाने लगे ||३||

‘नाश के कगार’ पर खड़ा है ‘विकास’ |


‘आस्था’ से कट चला और ‘विश्वास’ ||
‘पत्थरों’ से भी ‘कठोर’, हो गया ‘दुलार’ |
और ‘स्नेह’ बन गया है आज ‘व्यापार’ ||
‘कौड़ी-मोल’लोग ‘दिल’ बिकाने लगे |
‘भावना’ की खिल्लियाँ उड़ाने लगे ||
‘वासना’ को अंग से लगाने लगे |
हम तो ‘चोट’ पर ‘चोट’ खाने लगे ||४||


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शनिवार, 15 दिसंबर 2012

मुकुर(यथार्थवादी त्रिगुणात्मक मुक्तक काव्य) (ट)विराग- गीत | (१)किससे करें मिताई ! (एक आइना)


प्रसाद गुणीय-शान्त रसीय गीत (सारे चित्र 'गूगल-खोज'से साभार )

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
‘सांसारिक हर बन्धन’ झूठा |
‘स्नेह का हर इक नाता’ टूटा ||
रह गयी, ‘वित्त-कमाई’ |
किससे करें मिताई !!१!!

‘वाणी’ में, ‘छलमयी मधुरता’ |
और न ‘छलिया चित्त’ सुधरता ||
‘ज़िन्दगानी’ यों बितायी |
किससे करें मिताई !!२!!


‘स्वार्थ’ साधने की है ‘पटुता’ |
‘व्यवहारों’ में है ‘कपट की कटुता’ ||
‘मन’ मेरा ‘हरजाई’ |
किससे करें मिताई !!३!!

‘देश-धरा’ को धरा ‘ताक़’ में |
हर कोई है ‘अपनी ताक’ में ||
ऐसी ‘नीति’ चलाई |
किससे करें मिताई !!४!!

 
‘जग’, ‘सोने चाँदी का पिन्जरा’ |
‘प्रीति का पन्छी’ इसमें है घिरा ||
अब तक ‘मुक्ति’ न पाई |
किससे करें मिताई !!५!!


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शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

मुकुर(यथार्थवादी त्रिगुणात्मक मुक्तक काव्य)(झ)ऊँचे रिश्ते ‘प्यार’ के | (५)ऊँची भरें ‘उड़ान’ रे ! (प्रेम का रूप-एक यथार्थ) !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

(प्रसाद गुणीय-शान्तरसीय गीत)
(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)


’प्यार के नील गगन’ में ‘पंछी’-
ऊँची भरें ‘उड़ान’ रे !
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!           
चलो बचायें, ‘तितली-भँवरे’ |
कोई इनके ‘पर’ मत कतरे ||
‘स्वर्ग’ हमारी ‘धरा’ पे उतरे-     
‘परी-लोक मधुवन का’ सँवरे ||
महके, ‘मीठी महक’ से, सुन्दर-
‘भावों का उद्यान’ रे !!
’प्यार के नील गगन’ में ‘पंछी’-
ऊँची भरें ‘उड़ान’ रे !!१!!
 
बड़ा ‘भरोसा’ है ‘छल-बल’ का |
‘सारा जग’, पूजक ‘तन-बल’ का ||
कोई ‘अकेला’ ऐंठा, कोई-
‘गर्व-दर्प’ करता ‘दल-बल’ का ||
‘नश्वर’ है सब, ‘तथ्य’ भूल कर-
है कितना अभिमान रे !!
’प्यार के नील गगन’ में ‘पंछी’-
ऊँची भरें ‘उड़ान’ रे !!२!!


‘कोई डूबा ‘रूप-कूप’में |
कोई झुलसा, ‘मदन-धूप’ में ||
कोई ‘भेद के जाल’ में उलझा-
अन्तर करता, ‘रंक-भूप’ में ||
‘ईश्वरीय सत्ता’ से ‘मानव’-
है कितना ‘अनजान’ रे !!
’प्यार के नील गगन’ में ‘पंछी’-
ऊँची भरें ‘उड़ान’ रे !!३!!

‘चेहरे की लाली’ विलुप्त है |
‘सत्य-बुद्धि का बल’ भी लुप्त है ||
‘विवेचना से हीन तर्क’ है-
‘साहस, शौर्य, ओज’ सुप्त है ||
कौन बचाये, ‘तची धूप’ से-   
टूटे हुये ‘वितान’ रे !!
’प्यार के नील गगन’ में ‘पंछी’-
ऊँची भरें ‘उड़ान’ रे !!४!!

‘हाव-भाव’ में है ‘बेशर्मी’ |
‘वाणी’ में ‘गुर्राहट-गर्मी’ ||
‘आचरणों’ में, ‘व्यवहारों’ में-
नहीं तनिक भी ‘ठण्डक-नर्मी’ ||
‘मन’ में ‘बर्बरता’, ‘होठों’ पर-
‘थकी-बुझी मुस्कान’ रे !!
’प्यार के नील गगन’ में ‘पंछी’-
ऊँची भरें ‘उड़ान’ रे !!५!!


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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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