Blogger द्वारा संचालित.

Followers

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

दीपावली की रचनायें (८)गोवर्द्धन गिरिधारी


(सारे चित्र गूगल-खोज से साभार)  




==============
लाखों गायें चराईं थीं, ‘गोवर्द्धन गिरिधारी’ ने |
वन औ बाग बचाये थे, ‘वृज-वासी वनवारी’ ने ||
================================  
‘दानव’ मारे, ‘पर्यावरण’ के घातक, धूर्त पिशाचों से |
‘व्रज’ क्या, ‘पूरा देश’ बचाया, ‘नारकीय कु-विनाशों’ से ||
‘मानवता’ की रक्षा की थी, ‘प्यारे कृष्ण मुरारी’ ने ||
लाखों गायें चराईं थीं, ‘गोवर्द्धन गिरिधारी’ ने ||१||

‘न्याय’ का दिया साथ ‘कान्हां’ ने, ‘लाज’ बचाई ‘नारी’ की |
‘निर्धन’ को अपनाया, बना के मीत, ‘सम्पदा’ वारी थी ||
एक ‘नये ही युग’ की ‘रचना’ की, ‘द्वापर-अवतारी’ ने ||
लाखों गायें चराईं थीं, ‘गोवर्द्धन गिरिधारी’ ने ||२||


“प्रसून” खिला के, आचरणों के, ‘बागों’ में ‘व्यवहारों’ के |
‘अहंकारों से हीन’ किये थे, कितने ‘यत्न’ सुधारों के ||
इसी लिये तो, ‘वासुदेव’ को पूजा हर ‘नर’-‘नारी’ ने ||
लाखों गायें चराईं थीं, ‘गोवर्द्धन गिरिधारी’ ने ||३||


==================================

दीपावली की रचनायें(७)भैया-दूज




भाई-दूज का टीका करने, बहन  'भ्रात-घर' आये |

'भाई-बहन' के प्यार' को यह त्यौहार 'अमर' कर जाये |

***************************************

घर से चल कर आयी बहना, मन के मोती धोये |

थाल में लिये मिठाई, 'मन' में 'शुभकामना' संजोये || 

'मीठे हर्ष'  बटोरे आई  बहन  दुआयें  करती-

'दुखड़े' कभी न जागें, 'खुशियाँ, और कभी मत सोयें ||

'दुर्भाग्य' का पाँव पड़े मत, कभी 'तुम्हारी देहरी'- 

भैया के सौभाग- बाग' पर, 'आँच' कभी मत आये ||

भाई-दूज का टीका करने, बहन  'भ्रात-घर' आये ||१||


कभी न 'क्षत' हों  'प्रेम-भावना', अर्थ यही 'अक्षत' का |

पुष्पों का है अर्थ कि, महके रूप 'ह्रदय-मधुवन' का ||

'रोली', 'खुशियों की लाली' का रंग निखारे निशि-दिन-   

तथा 'कलाबा' और करे दृढ़, 'बन्धन भाई बहन का' ||

'दीप आरती का' जीवन भर, 'जगमग  ज्योति' बिखरे-   

'सरस  नारियल'  उस  की  'बुद्धि'  में, 'मधुरिम स्नेह' बसाये ||

 भाई-दूज का टीका करने, बहन  'भ्रात-घर' आये ||२||

'हर भैया' सद्गुणी बने औ,जीवन सफल बिताये !

हर बहना आचरणवती हो, रूप और गुण पाये  !!


दोनों अपना 'आप' सुधारें, फिर यह देश सुधारें-

'व्रत' लें ' आदर्शों का, ऐसी  'भैयादूज' मनायें  ||

'नयी सोच' में  'सोच पुरानी', 'मिसरी-जल' सी घोलें-  

कुछ 'कुरीतियाँ'  दूर करें, कुछ 'अच्छी रीति' निभायें ||


 भाई-दूज का टीका करने, बहन  'भ्रात-घर' आये ||३||


कर के टीका, कहती बहना, अरे ध्यान धर भैया !


दान में मुझे न चाहिये सोना,चाँदी, या कि रुपैया  !!

जब आऊँ तो 'प्यार' मुझे, परिवार सहित तुम करना !  

खिले सुहाने "प्रसून" जैसे, हँसो उम्र भर 'भैया' !!

'कड़वाहट' घर करे न  'मन' में, मिठास साथ न छोड़े- 

'ऐसा मीठा' खाये भैया,बहना उसे खिलाये ||

भाई-दूज का टीका करने, बहन  'भ्रात-घर' आये ||४||



==================================     

बुधवार, 14 नवंबर 2012

दीपावली की रचनायें(६)गोवर्धन'-पूजा

अभिधा 'शब्द-शक्ति' का सरल सुबोधगम्य एक गीत |

(सारे चित्र 'गूगल-खोज से साभार) 



'दीपावाली  की पीठ' पे आया, 'पर्व' है 'गोवर्धन' |
++++++++++++++++++++++++++++++

जली रोशनी जगमग, 'तारे गगन के' शर्माये' |

मिलें 'दिलों' से 'दिल' हम सब के, 'प्यार' से गरमाये || 

बच्चे, बूढ़े, जवान खुश थे  झूमे  नर नारी-

खुशियों से भर उठे थे सब के सजते  'घर आँगन' ||

'दीपावाली  की पीठ' पे आया, 'पर्व' है 'गोवर्धन' ||१||


थाल सजा कर,चलो,आरती गायों की कर लें |

उन्हें खिला कर भोजन, 'बर्तन' दूध से हम भर लें ||

पशु-धन पालें और करें हम, उन की हर सेवा-

करें दुधारू पशुओं का हम, ऐसे 'सम्वर्धन' ||

'दीपावाली  की पीठ' पे आया, 'पर्व' है 'गोवर्धन' ||२||


वन-बागों की रक्षा कर के, 'पर्यावरण' बचायें |

'चारागाह' बना कर अच्छे, गायें वहाँ चरायें ||

उन की प्यास बुझाने,उन को प्यार से नहलाने-

'सुन्दर सरस पोखरों का हम करेंगे संरक्षण ||

'दीपावाली  की पीठ' पे आया, 'पर्व' है 'गोवर्धन' ||३||


"प्रसून", 'कान्हां' जैसे 'गायों के चरवाहे' हों |

स्वस्थ नागरिक, 'भारत माता' के मन चाहे हों ||

दूध और घी, माखन खा कर, हृष्ट, पुष्ट सब हों- 

पूरे जग में हो 'भारत के गौरव' का गुन्जन ||४||

   

++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++

      
   

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

दीपावली की रचानायें (५)दीवाली-गीत



************
चलो जलायें दीप, आज ‘दीवाली के’ !
मिल कर गायें गीत, ‘सुखद खुशहाली’ के ||
**********************************  
मत ‘नफ़रत की आग’ जलाये, कोई भी |
‘वैर के कर्कश राग’ न गाये, कोई भी ||
देखो, ‘सुन्दर अमन की उजली चादर’ में –
‘मैले’ अब मत ‘दाग’ लगाये, कोई भी ||
‘कजरी, गोधन, भजन, कीर्तन’ गूँजें बस-
‘छन्द’ सम्मिलित हो जायें, ‘कब्बाली’ के |
मत उभरें ‘स्वर’ कहीं ‘बदनुमा गाली के’ || 
चलो जलायें दीप, आज ‘दीवाली के’ !!१!!

‘मुहँ मोड़े रूठों’ को आज मना लेंगे |
‘दुश्मन’ को भी ‘अपना मीत’ बना लेंगे ||
‘शिकवे, गिले’ मिटा कर पास में बैठेंगे-
सुन कर ‘सब की’, ‘अपनी बात’ सुना लेंगे ||
मिटे ‘विमुखता’, ‘उन्मुखता की ताल’ बजे-
बन जायें हम आज, ‘जुड़े कर ताली के’ |
‘मौन अँधेरा’ काटें, ‘स्वर उजियाली के’ ||  
चलो जलायें दीप, आज ‘दीवाली के’ !!२!!

चलो, ’बाग’ से, ‘कलह के काँटे’, काटें हम !
करें ‘जतन’, ‘सब खरपतबारें’ छाँटें हम !!
‘दिल’,’वीराने’ हुये कहीं हुये कहीं, उनको ढूँढ़ें-
‘गन्ध भरी सुन्दर सौगातें’ बाँटें हम ||
‘हास’ बिखेरें, ‘सु-मन’, “प्रसून” सभी मिल कर- 
हम ‘पादप खुशनुमा’, ‘एक ही माली’ के |
हम हैं ‘सुन्दर पुइष्प’, ‘एक ही डाली के’ ||
चलो जलायें दीप, आज ‘दीवाली के’ !!३!!



***********************************

About This Blog

साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

मेरे सभी ब्लोग्ज-

प्रसून

साहित्य प्रसून

गज़ल कुञ्ज

ज्वालामुखी

जलजला


  © Blogger template Shush by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP