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मंगलवार, 6 नवंबर 2012

मुकुर(यथार्थवादी त्रिगुणात्मक मुक्तक काव्य) (च )घट-पर्णी (३) राजनीति की आड़ (गम्भीर व्यंग्य)





 
  
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राजनीति की आड़ में करते, बड़ेघिनौने काम कई ||

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सभी हदों को पार हो गये |

ये कितने ‘मक्कार’ हो गये ||

करें ‘खुशामद’ से ये ‘आमद’-

कितने ‘शेर’, ‘सियार’ हो गये ||

‘कुर्सी के घुन’ चिपके ‘कुर्सी’ से,ताज कर के ‘लाज-शर्म’|

छोड़ के ‘मेहनत’, ‘काले धन’ से, करते ‘बड़े हराम’ कई||

राजनीति की आड़ में करते, बड़ेघिनौने काम कई ||१||



‘नशे’ में ‘मदहोश’ ये बैठे |

खो कर ‘होश’, ‘मोद’ में बैठे ||

‘सफ़ेद झूठ’ की ‘हाँ में हाँ’ कर-

बने ‘सफ़ेद पोश’ हैं बैठे ||

कर के ‘यारी’, दगा करें जो, ‘गद्दारी’ में हैं माहिर |

छू कर पाँव जो मारें ‘गान्धी’, ऐसे ‘नाथूराम’ कई ||

राजनीति की आड़ में करते, बड़ेघिनौने काम कई ||२||


मन में ‘पापों भरे खोट’ भर |

‘दुखी चोट’ पर ‘नयी चोट’कर||

बन कर ‘अवसरवादी गिरगिट’-

‘विश्वासों’ का गला घोंट कर ||

‘अपनी मेहनत’,अपने कर्म’ से, इनको क्या लेना देना !

‘औरों की मेहनत’ की चोरी, करें कमाते ‘नाम’ कई ||

राजनीति की आड़ में करते, बड़ेघिनौने काम कई ||३||

‘फ़र्ज़’ से फिरते भागे भागे |

बिना काम के ‘माल’ ये माँगें ||

इनका कोई विरोध करता-

उस पर ‘कुटिल’,गोलियाँ दागें ||

इनसे हार गयी ‘मक्कारी’,’सज्जन’ बने ‘लुटेरे’ हैं |

लूट ‘खज़ाना राज कोष का’, भरते निज घर ‘दाम’ कई ||

राजनीति की आड़ में करते, बड़ेघिनौने काम कई ||४||


करते हैं ये ‘जमाखोरियाँ’ |

‘खाद’ बन गयीं, कई ‘बोरियाँ’||

दिखते हैं ‘ईमानदार’ पर-

मौक़ा मिले तो करें ‘चोरियाँ’ ||

‘जनता’ भूखों मरती इनको, इसकी कुछ परवाह’ नहीं |

‘अन्दर ग्राउण्ड’ छुपे हैं इनके, ‘भरे हुये गोदाम’ कई ||

राजनीति की आड़ में करते, बड़ेघिनौने काम कई ||५||


‘स्विसबैंक’ में ‘खाते’ इन के |

‘नेताओं’ से ‘नाते’ इनके ||

‘विदेश’ के ‘ऊँचे स्कूल’ में-

बच्चे पढने जाते इन के ||

‘पाँच सितारा होटेल’ जा कर, ‘सुरा-सुन्दरी’ में डूबे-

‘मुफ़्त का माल’ उड़ा कर करते, हैं ‘रंगीनी शाम’ कई ||

राजनीति की आड़ में करते, बड़ेघिनौने काम कई ||६||



‘आदर्शो’ के ये ‘ढोंगी’ हैं |

“प्रसून”, ‘ये योगी’,’भोगी’ हैं ||

‘नदिया’ कैसे पार करेंगे-

‘छेदों वाली’ ये ‘डोंगी’ हैं ||

रोज़ मिले ‘सम्मान’,’सभा’ में,’अखबारों’ में रोज़ छपें |

खुद खरीद कर ‘शाल’ ओढ़ कर, लेते ‘मान-इनाम’ कई||

राजनीति की आड़ में करते, बड़ेघिनौने काम कई ||७||



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रविवार, 4 नवंबर 2012

मेरे एक माधुर्य गुण प्रधान ग्रन्थ 'गुन्जन' से



             

शरद             शरद-ऋतु
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         प्यारा प्यारा, सुन्दर सुन्दर, ‘शरद का यह  मौसम’ |
  भर    
          भरता उमंग मन के अन्दर, ‘शरद का यह मौसम || मौसम'                                           

  ‘जल का दर्पण’ दिखलाते हैं, ‘ताल-नदी के कूल’ ||

 आज उपेक्षित घासों पर भी, खिल आये हैं फूल |

   ‘छटा’ बिखेर के, ‘हास’ लुटाते, हैं कितना अनमोल !

   ‘इन फूलों की गोद’ में, ‘तितली-भँवरे’ रहे हैं झूल ||
   
      बना आज है ‘सुख का सागर’, ‘शरद का यह मौसम’||
         
         प्यारा प्यारा, सुन्दर सुन्दर, ‘शरद का यह  मौसम’ ||१||


                   विजयादशमी, करवाचौथ, दिवाली के उपहार |
         
         भाई-दूज, कातिकी-पूनम, का ले कर ‘प्यार’ ||
                   
         ‘हर्ष और उल्लास’ बटोरे, मगन हुई, यह आयी-
         
         ‘यह ऋतु’ लायी, ‘अपनी झोली’ में कितने ‘त्यौहार’ !!
         
          चला बनाने, हर घर ‘मन्दिर’, ‘शरद का यह मौसम’ ||
         
         प्यारा प्यारा, सुन्दर सुन्दर, ‘शरद का यह  मौसम’ ||२||

           कोयल, मैना, तोते, हरियल, गाते ‘चरों ओर’ |
         
          ‘पके धान के खेत’ सुहाते, भाते चारों ओर ||
         
           मक्का, ज्वार, बाज़रा, तिल की पकी झुकी हर डाल |
            
          इन डालों पे पन्छी, दाने खाते चारों ओर ||
         
          लाया बड़ा ‘खुशनुमा मंज़र’, ‘शरद का यह मौसम’ ||
           
         प्यारा प्यारा, सुन्दर सुन्दर, ‘शरद का यह  मौसम’ ||३||

        
         कनेर, कचनारों की डाली, हँसी, झुकी लजियाती |  
            
         फूलों जैसी ‘फूली खुशियाँ’, ‘हर दिल’ में भर जातीं ||      
        
         आसमान में धूल नहीं है, औ कीचड़ धरती पर-
          
         ‘हर बगिया’, ‘सुन्दर “प्रसून” के गुच्छों’ से सज जाती ||
         
         लेता है सब के मन को हर, ‘शरद का यह मौसम’ ||
        
         प्यारा प्यारा, सुन्दर सुन्दर, ‘शरद का यह  मौसम’ ||४|| ||  ||

            
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साहित्य समाज का दर्पण है |ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि, सब कुछ मीठा ही तो नहीं , कडवी झाडियाँ उगती चली जा रही हैं,वह भी नीम सी लाभकारी नहीं , अपितु जहरीली | कुछ मीठे स्वाद की विषैली ओषधियाँ भी उग चली हैं | इन पर ईमानदारी से दृष्टि-पात करें |तुष्टीकरण के फेर में आलोचना को कहीं हम दफ़न तो नहीं कर दे रहे हैं !!

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